
दीपावली जा चुकी लेकिन ब्लॉग जगत अब भी रौशन है आप अदीबों के ज़हनी चरागों से निकली अशआर की रौशनी से ;दीपावली इतनी शायराना होगी सोचा न था ;आयोजक थे सुबीर जी और मुझे आमंत्रित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी नीरज गोस्वामी जी को जो हैं तो मेरे ममेरे भाई लेकिन सगे से बढ़ कर. अभिनय और शायरी का शौक़ उधर से ही इधर हस्तांतरित हुआ है ;वो भी एक लम्बी दास्ताँ है जो बाद में बताउंगी ,हालांके बहुत सी दास्तानें सुनाना बाकि है जिनका मैंने वादा किया था ;क्यों नहीं सुना पायी ये भी ये भी 'बाद में बताउंगी ' :))
भैय्या के कहने पर पहले तो मैंने टालमटोल से काम लिया लेकिन फिर सोचा की दिमागी मशक्क़त भी ज़रूरी है जैसा कि मैंने सुबीर जी के ब्लॉग में लिखा है के खुद को आज़माते रहना चाहिए तो बस तरही मुशायरे में शामिल होने का सोचा और इक ग़ज़ल हो गयी वो ज़माना याद आ गया जब मेरे गुरु मरहूम राही शहाबी मुझे मिसरा दिया करते थे मश्क़ के लिए और जब मैं शेर कहती थी तो डांट मिलती थी 'ये कोई शेर है ?'हालाँकि बहुत कम समय तक उनका मार्गदर्शन रहा क्योंकि उनकी और मेरी फिक्रो -सोच में काफी फ़र्क़ था ;जो अक्सर एक मर्द शायर और महिला शायर की सोच में हो सकता है और होना भी चाहिए तो बस इस्लाह का सिलसिला ख़त्म हो गया और मैं जयपुर से मुंबई आ गयी. अलिफ़ लैला सीरियल में अभिनय करने ;तब से एक अरसे बाद अब किसी तरही मुशायरे में हिस्सा लिया है और यकीन जानिए बहुत लुत्फ़ आया.
आपकी दुआओं ने ताजगी दी ;गोके आप मेरी ये ग़ज़ल सुबीर जी के ब्लॉग में पढ़ चुके हैं लेकिन एक बार फिर शाया कर रही हूँ अपने ब्लॉग में भी कुछ और ताजा अशआर के साथ तो ग़ज़ल का मतला समात फरमाएं ;
जब अँधेरे अना में नहाते रहें
दीप जलते रहें ,झिलमिलाते रहें
रात लैला की तरह हो गर बावरी
बन के मेहमान जुगनू भी आते रहें
रुह रौशन करो तो कोई बात हो
कब तलक सिर्फ चेहरे लुभाते रहें ?
इक पिघलती हुई शम्म कहने लगी
उम्र के चार दिन जगमगाते रहें
फ़िक्र की गोपियाँ रक्स करती रहीं
गीत बन श्याम बंसी बजाते रहें
कोई बच्चों के हाथों में बम दे चले
वो पटाखा समझ खिलखिलाते रहें
दूध ,घी ,नोट ,मावा के दिल हो "हया".
अब तो हर शै मिलावट ही पाते रहें
नोट;;लैल रात को कहते हैं और रात काली होती है ;लैला का नाम इसीलिए लैला हुआ के वो काली थी
अना -घमंड
रक्स -नृत्य
और ये वो शेर हैं जो हो तो गए थे लेकिन मैंने उस पोस्ट में भेजे नहीं थे वो भी सुन लीजिये...मतले में तरमीम के साथ ...
अब चलो खुद को यूँ आज़माते रहें
शेर कहते हुए मुस्कुराते रहें
मश्क़ भी है ज़रूरी यही सोच कर
हम गिरह प गिरह इक लगाते रहें
रात भी ढल चुकी चाँद भी जा चुका
हम घड़ी को कहाँ तक मंनाते रहें
जब कमाना भी है ,घर चलाना भी है
क्या संवरते औ ख़ुद को सजाते रहें
प्यार की रौशनी और शफ्फाफ़ हो
गर वफ़ा में हया भी मिलाते रहें .






