Tuesday, November 10, 2009

गोपियाँ रक्स करती रहीं


दीपावली जा चुकी लेकिन ब्लॉग जगत अब भी रौशन है आप अदीबों के ज़हनी चरागों से निकली अशआर की रौशनी से ;दीपावली इतनी शायराना होगी सोचा न था ;आयोजक थे सुबीर जी और मुझे आमंत्रित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी नीरज गोस्वामी जी को जो हैं तो मेरे ममेरे भाई लेकिन सगे से बढ़ कर. अभिनय और शायरी का शौक़ उधर से ही इधर हस्तांतरित हुआ है ;वो भी एक लम्बी दास्ताँ है जो बाद में बताउंगी ,हालांके बहुत सी दास्तानें सुनाना बाकि है जिनका मैंने वादा किया था ;क्यों नहीं सुना पायी ये भी ये भी 'बाद में बताउंगी ' :))

भैय्या के कहने पर पहले तो मैंने टालमटोल से काम लिया लेकिन फिर सोचा की दिमागी मशक्क़त भी ज़रूरी है जैसा कि मैंने सुबीर जी के ब्लॉग में लिखा है के खुद को आज़माते रहना चाहिए तो बस तरही मुशायरे में शामिल होने का सोचा और इक ग़ज़ल हो गयी वो ज़माना याद आ गया जब मेरे गुरु मरहूम राही शहाबी मुझे मिसरा दिया करते थे मश्क़ के लिए और जब मैं शेर कहती थी तो डांट मिलती थी 'ये कोई शेर है ?'हालाँकि बहुत कम समय तक उनका मार्गदर्शन रहा क्योंकि उनकी और मेरी फिक्रो -सोच में काफी फ़र्क़ था ;जो अक्सर एक मर्द शायर और महिला शायर की सोच में हो सकता है और होना भी चाहिए तो बस इस्लाह का सिलसिला ख़त्म हो गया और मैं जयपुर से मुंबई आ गयी. अलिफ़ लैला सीरियल में अभिनय करने ;तब से एक अरसे बाद अब किसी तरही मुशायरे में हिस्सा लिया है और यकीन जानिए बहुत लुत्फ़ आया.

आपकी दुआओं ने ताजगी दी ;गोके आप मेरी ये ग़ज़ल सुबीर जी के ब्लॉग में पढ़ चुके हैं लेकिन एक बार फिर शाया कर रही हूँ अपने ब्लॉग में भी कुछ और ताजा अशआर के साथ तो ग़ज़ल का मतला समात फरमाएं ;

जब अँधेरे अना में नहाते रहें
दीप जलते रहें ,झिलमिलाते रहें

रात लैला की तरह हो गर बावरी
बन के मेहमान जुगनू भी आते रहें

रुह रौशन करो तो कोई बात हो
कब तलक सिर्फ चेहरे लुभाते रहें ?

इक पिघलती हुई शम्म कहने लगी
उम्र के चार दिन जगमगाते रहें

फ़िक्र की गोपियाँ रक्स करती रहीं
गीत बन श्याम बंसी बजाते रहें

कोई बच्चों के हाथों में बम दे चले
वो पटाखा समझ खिलखिलाते रहें

दूध ,घी ,नोट ,मावा के दिल हो "हया".
अब तो हर शै मिलावट ही पाते रहें

नोट;;लैल रात को कहते हैं और रात काली होती है ;लैला का नाम इसीलिए लैला हुआ के वो काली थी
अना -घमंड
रक्स -नृत्य

और ये वो शेर हैं जो हो तो गए थे लेकिन मैंने उस पोस्ट में भेजे नहीं थे वो भी सुन लीजिये...मतले में तरमीम के साथ ...

अब चलो खुद को यूँ आज़माते रहें
शेर कहते हुए मुस्कुराते रहें

मश्क़ भी है ज़रूरी यही सोच कर
हम गिरह प गिरह इक लगाते रहें

रात भी ढल चुकी चाँद भी जा चुका
हम घड़ी को कहाँ तक मंनाते रहें

जब कमाना भी है ,घर चलाना भी है
क्या संवरते औ ख़ुद को सजाते रहें

प्यार की रौशनी और शफ्फाफ़ हो
गर वफ़ा में हया भी मिलाते रहें
.

Thursday, October 15, 2009

ये तितली

एक तरफ दीपों के त्यौहार की सजावट तो दूसरी तरफ चुनावी माहौल की गिरावट ,गोया खूबसूरत मखमल पर पैवंद लग गया हो ;ख़ुदा करे सब शांति से संपन्न हो जाये ;कहीं मेरी ग़ज़ल फिर न सिहर के कह उट्ठे ;





अंधेरों मैं जो आज इक रौशनी मालूम होती है
ये बस्ती अम्न की जलती हुई मालूम होती है

सियासत कैसे गंदे मोड़ पे लायी है इंसां को
के अब इंसानियत दम तोड़ती मालूम होती है

ख़ुदा के नाम पे इंसान की हैवानियत देखो
अजां से जंग करती आरती मालूम होती है

हम उनकी दिल्लगी को भी समझते हैं लगी दिल की
उन्हें दिल की लगी भी दिल्लगी मालूम होती है

गुलों का छोड़ कर दामन ये क्यों बैठी है काँटों पे
ये तितली तो बहुत ही दिलजली मालूम होती है

हवादिस ने मेरे चेहरे पे ऐसे नक़्श छोड़े हैं
मुझे अपनी ही सूरत अजनबी मालूम होती है

इधर दिल है,उधर दुनिया नहीं मालूम क्या होगा
"हया"अब आज़माइश की घड़ी मालूम होती है.

अजां -अजान
हवादिस -हादसे

आप सभी को दीपावली की अग्रिम शुभकामनायें

Friday, September 25, 2009

दुआ चाहिए

मुझे पढ़ने वाले ,समझने वाले ,हौसला अफजाई करने वाले तमाम ब्लॉगर्स का मैं तहे-दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ जो अपने बेशकीमती कमैंट्स से मुझे नवाज़ते हैं ;कुछ तो रूह में उतर जाते हैं हालांकि सबका ज़ाती तौर पर जवाब नहीं दे पाती इसके लिए शर्मिन्दा भी हूँ पर आप सबके नाम मुझे बखूबी याद हो गए हैं. मैंने वादा किया था के कई सम्मेलनों की दास्ताँ आप तक पहुंचाऊंगी लेकिन अभी उसमे वक़्त है,,ये सिलसिला इस पूरे महीने चलने वाला है लेकिन तब तक आप से गुफ्तगू न हो ये नहीं चल सकता ..तो लीजिये पेशे -खिदमत है एक छोटी सी ग़ज़ल आप सबकी मुहब्बतों के नाम



ज़िन्दगी में भला और क्या चाहिए
उसकी रहमत तुम्हारी दुआ चाहिए

चाहती हूँ दिलूँ में महकती रहूँ
मैं हूँ खुशबू वफ़ा की हवा चाहिए

मैं ग़ज़ल तो कहूँगी मगर शर्त है
सुनने वाला कोई आपसा चाहिए

हादसों से तो मिलना बहुत हो चुका
आपसे भी तो मिलना ज़रा चाहिए

आपने जब दुआ दी तो ऐसा लगा
आपको भी अदब में "हया "चाहिए .

शुक्रिया

मुझे तुलसी भाई पटेल जी के बच्चों की तरफ से एक बहुत प्यारा मेल मिला था ,,इस ग़ज़ल का तीसरा शेर ख़ास तौर से उन बच्चों के नाम ;जो के छोटे हैं मगर शेर खूब समझते हैं इस दुआ के साथ

सभी को समझे तू अपना कोई बुरा ना लगे
ख़ुदा करे तुझे इस दौर की हवा ना लगे


Monday, September 14, 2009

हिंदी दिवस


हिंदी दिवस पर समस्त हिंदी प्रेमियों और हिन्दुस्तानियों को बधाई.सोचा तो था के सुबह सुबह मुबारकबाद पेश करुँगी लेकिन कवि सम्मेलनों का सिलसिला चालू है,पूरा हिंदुस्तान हिन्दीमय होगया है,हिंदी को याद करने के नए नए तरीके ढूंढे जा रहे है,हर ऑफिस हर विभाग में हिंदी से सम्बंधित कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे है,कहीं खुद को राष्ट्रभाषा प्रेमी साबित करने के लिए तो कहीं बजट में सरकार को हिंदी के ऊपर हुआ ख़र्चा दिखाने के लिए,कवियों की चांदी हो रही है ;मै भी कुछ कवि सम्मलेन पढ़ चुकी हु कुछ पढ़ने वाली हूँ , इस पूरे महीने हिंदी पखवाड़ा मनने तक, सब कार्यक्रमों की दास्ताँ बाद में बताऊंगी अभी हिंदी भाषा की विभिन्न स्थितियों पर एक एक करके नज़र डालिए :

१) हिंदी की कसक :-

सोचा न था मगर मुझे आभास हो गया
बेघर हूँ अपने घर में ये विश्वास होगया
सीमित है पुस्तकों के ही पन्नो तलक ये अब
हिंदी में बात करना तो इतिहास होगया

२)हिंदी ज़रूरी है क्यूंकि :-

अगर हिंदी समझते हो ग़ज़ल फिर रास आयेगी
सुहानी कल्पना चलकर तुम्हारे पास आयेगी
सितारे इश्क़ फरमाएंगे,चंदा घर बुलाएगा
कला,तहज़ीब भी मिलने तुझे बिंदास आयेगी.

३)क्यूकि भाषा एक तहजीब है और नेमत भी:-

सभी के पास उसकी रहमतों का धन नहीं होता
जो होता भी है तो फूलों के जैसा मन नहीं होता
के जो लोगो के ग़म, तकलीफ और जज़्बात को समझे
वही होता है कवि, हर बाग़ वृंदावन नहीं होता

४)क्यों मैंने सच कहा न? :-

ह्रदय के ग्रन्थ से निकले हितैषी है वही रचना
किसी हिंदी विरोधी के घृणित सन्देश से बचना
हो भाषाविद 'हया' लेकिन सरलता तो हो भाषा में
कभी तो राष्ट्र भाषा बोलिए,मैंने कहा सच न?

५)तो बोलिए हिंदी है हम...........वतन है हिनुस्तान हमारा:-

यहाँ पर राम बसता है,यहाँ रहमान बसता है
यहाँ हर ज़ात का,हर कौम का इन्सान बसता है
जो हिंदी बोलते है बस वही हिन्दू नहीं होते
वही हिन्दू हैं जिनके दिल में हिंदुस्तान बसता है


" जय हिंद"

Monday, September 7, 2009

जुर्म अब ईमान.....



आदमी शैतान होता जा रहा है
क्या उसे भगवान होता जा रहा है

ये निठारी काण्ड तौबा देख कर हा!
ख़ुद ख़ुदा हैरान होता जा रहा है

हैं मेरे हालत तो ईराक़ जैसे
हौसला ईरान होता जा रहा है

धर्म तो नेताओं के हत्थे चढ़ा है
जुर्म अब ईमान होता जा रहा है

मैच फिक्सर या पुलिस की जेब में अब
नोट ही मेहमान होता जा रहा है

देन है उसकी हुनर के शोहरतें फिर
क्यों उसे अभिमान होता जा रहा है

वो जो मुझ पर तंज़ करता है 'हया' जी
ख़ुद ही बेईमान होता जा रहा है

Tuesday, August 25, 2009

मुहब्बत हूँ




मेरे दिल पर किसी की भी हुकूमत चल नहीं सकती
मुहब्बत हूँ मेरे आँचल में नफ़रत पल नहीं सकती

करोगे इश्क़ नफ़रत से तो धोखा खाओगे इक दिन
मुहब्बत नाम की औरत कभी भी छल नहीं सकती

उन्हें हिंसा गवारा है, हमें इंसान प्यारा है
कभी इंसानियत खूनी सड़क पर चल नहीं सकती

मैं जब कुछ कर नहीं सकती तो फिर ये सोच लेती हूँ
मुक़द्दर में यही है और होनी टल नहीं सकती

न जाने कौन है जिनको बुराई रास आती है
'हया' को तो गुनाह की एक पाई फल नहीं सकती

Friday, August 7, 2009

औरत हूँ आईना नहीं


पहले तो अपने आप से नज़रें मिलाईये
फिर चाहे हम पे शौक़ से तोहमत लगाईये

मेहनत की भट्टियों में झुलसना तो छोडिये
रिश्तों की आंच में ज़रा तप कर दिखाईये

औरत हूँ आईना नहीं जो टूट जाउंगी
इन पत्थरों से और किसी को डराईये

बनना है ग़र अमीर तो बस इतना कीजिए
ज़िस्मों की क़ब्र खोद के किडनी चुराईये

अशआर तो होते ही सुनाने के लिए हैं
लेकिन 'हया, के साथ इन्हें गुनगुनाईये

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