Friday, July 23, 2010

बन्दर क्या जानें अदरक का स्वाद

"शुक्रिया" एक ऐसा लफ़्ज़ है जिसका कोई सानी नहीं, कोई बदल नहीं ; कोई तारीफ़ करे तो "शुक्रिया" ; दुआ दे तो "शुक्रिया" ; बुरा करे तो "शुक्रिया" और बद्दुआ दे तो भी "शुक्रिया";तोहफ़ा दे तो "शुक्रिया"; आपकी मदद करे - ना करे ;मुलाक़ात करे-ना करे ; फोन करे-ना करे तो भी "शुक्रिया" ; तो जनाब आप सब का ,

"शुक्रिया" "शुक्रिया" "शुक्रिया"



आप सोचेंगे किसलिए भाई?ओफ़्फोह, जब हम किसी ख़ास मौक़े पर किसी को बधाई देते हैं तो वो पलट कर शुक्रिया अदा करता है ना? तो, दास्ताने-मुख़्तसर ये है कि .....

१२ जुलाई को मेरा ब्लॉग एक साल का हो गया ; अब ज़ाहिर सी बात है ये जानने के बाद तो आप उसे जन्म-दिन की बधाई देंगे ही ना? तो बस

"शुक्रिया" - "शुक्रिया" - "शुक्रिया"

अरे अब तो इतनी ख़ुशी मुझे अपने जन्म-दिन पर भी नहीं होती जितनी आज हो रही है ; बचपन में जरूर होती थी क्योंकि तब रिटर्न गिफ्ट का चलन नहीं था ; अब तो इस उत्सव में भी गिव एंड टेक की रस्म शामिल हो गयी ; ये पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण करते-करते हम अपनी बेलौस बेग़रज़ मुहब्बतों को कहाँ छोड़ आये हैं?
अब ऐसे मासूम , पाक-साफ़, स्वार्थ हीन रिश्ते तो सिर्फ अदबी परिवारों में ही नज़र आते हैं और उन्हीं से तअल्लुक़ रखते हैं : आप और हम -

"हैं जिनके पास अपने तो वो अपनों से झगड़ते हैं
नहीं जिनका कोई अपना वो अपनों को तरसते हैं
मगर ऐसे भी हैं कुछ पाक और बेग़रज़ से रिश्ते
जिन्हें तुमसे समझते हैं जिन्हें हमसे समझते हैं "

हाँ तो मैं कह रही थी कि मुझे ख़ुशी हो रही है और इस ख़ुशी के पीछे कई वजूहात हैं जैसे :-

१. अब मैं महफ़ूज़ हूँ
२. अब मुझे कोई नहीं चुरा सकता
३. अब मैं खो भी नहीं सकती
४. अब मैं जाविदाँ रहूंगी
५. जहाँ जाइएगा हमें पाइयेगा
६. अब तन्हाई भी मातम नहीं मनाती है , और
७. घर बैठे बैठे ही गोया नशस्त सी हो जाती है

अब ग़ज़ल के सात अशआर की तरह ये सातों कारण आपको ऊपरी तौर पर तो समझ आ गए होंगे लेकिन जनाब इसके पीछे छुपी है एक बहुत ही " ग़मग़ीन दास्तान" जो तमाम सबूतों के साथ मैं आपके सामने पेश करने वाली हूँ. जितना वक़्त लगा है मुझे वो सदमा भुलाने में , उस से ज्यादा वक़्त लगेगा आपको वो रुदाद सुनाने में ...लेकिन इस से क़ब्ल मैं अपनी पहली पोस्ट के पहले कमेन्ट करने वाले से लेकर मेरी अब तक की आख्रिरी पोस्ट के आखरी कमेन्ट करने वाले की तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ और उनकी भी जो :-

१. नियमित रूप से आते हैं
२. जो कभी कभी आते हैं
३. जो अब बिलकुल नहीं आते
४. जो मेल भेज कर ग़ायब हो जाते हैं , और
५. जो सोचते हैं कि वो नहीं आते तो हम भी नहीं जाते
फिर भी आप सभी ब्लॉगर मुझे बहुत बहुत हैं भाते

क्यूंकि मैं भी सबको जवाब नहीं दे पाती - किसी को शायद एक बार भी न दिया हो लेकिन ये सब मसरूफ़ियत, ग़फ़लत , लापरवाही, सुस्ती या भूल की वजह से हुआ होगा वर्ना मेरी हरचंद कोशिश रहती है कि मैं आप सबसे जुड़ी रहूँ क्यूंकि:

जिस जगह लोग हों घर तो वही घर होता है
वर्ना दिल तो किसी जंगल सा नगर होता है
सिर्फ मेहनत नहीं काफ़ी यहाँ शोहरत के लिए
अपने लोगों की दुआ का भी असर होता है

तो बस इस साल सबसे पहले येही काम होगा ; आप सबको कहाँ से ढूंढ - ढूंढ कर मिलूंगी- कुछ सवालात, आपत्तियों, शंकाओं...जिनका जवाब उधार रह गया था ; वो क़र्ज़ उतारूंगी और-और-और उन सबको आप सबकी तरफ से कड़ा जवाब भी दूँगी जो अक्सर पूछते हैं :-

१. अरे आपने ब्लॉग क्यूँ खोला ?
२. क्या ज़रुरत है, मंच है ना?
३. कैसे मेंटेन करती हैं ये सब?
४. वक्त मिल जाता है सबको पढने पढ़ाने का ?

तो भाई इन सबका एक ही जवाब है :-


"बन्दर क्या जानें अदरक का स्वाद"

सही है ना? अपनों के बीच रहने, उनसे मिलने- गुफ़्तगू करने, जुड़ने का अपना ही मज़ा है और अब तो हम सब एक परिवार हो गए हैं , आप सबके नाम और कलाम मेरे दिलो-दिमाग़ पर नक़्श हो गए हैं; आप सबके जज़्बात, रचनात्मक मेहनत, मुहब्बत, दुआएं, सुझाव मुझे अचंभित और हर्षित कर जाते हैं ;-

दीपक 'मशाल' सा प्यारा भाई, इस्मत ज़ैदी साहिबा सी आपा, प्रिया सी दोस्त, तुलसी भाई के बच्चों के प्यारे प्यारे मेल, शाहिद मिर्ज़ा साहब जैसे खैरख्वाह, सुभाष नीरव जैसे अदबी, उड़न तश्तरी जैसे मार्गदर्शक और स्मार्ट इंडियन जैसे स्मार्ट भाई,सुलभ भाई जैसे तकनिकी सलाहकार , रंजना, रचना, शमा, सदा,संगीता जैसी बहिने, आप सबके ब्लॉग गुरु पंकज सुबीर जी....उफ्फफ्फ्फ़...किस किसका नाम लूं - किसे छोडूँ - किसे?? और इस परिवार में मुझे शामिल करने का श्रेय जाता है मेरे भाई " नीरज गोस्वामी ' जी को, जो हाथ धो कर और लठ्ठ लेकर मेरे पीछे पड़ गए थे कि - ब्लॉग खोलो -ब्लॉग खोलो- ब्लॉग खोलो- और आखिर 12 जुलाई २००९ को ये नेक काम उनकी मदद से कर ही डाला; बस पहुँच गयी खोपोली तब से जो आने जाने और उनको परेशान करने का सिलसिला चालू है - मैं उनसे कहती हूँ कि "आपने शेरनी के मुंह खून लगा ही दिया है तो भुगतो" और वो भी हंस कर कहते हैं कि "सर ऊखली में दिया तो मूसली से क्या डरना?"

अरे हाँ वो रुदाद जो मैं पीछे छोड़ आई थी वो भी तो आपको सुनानी है- जिसने मुझे ये ब्लॉग खोलने पर मजबूर किया , लेकिन आज नहीं अगली पोस्ट में - क्रमशः ....
तब तक आप सबकी एक वर्षीय मुहब्बत के नाम एक ग़ज़ल :-

ये मुहब्बत तो मौला की सौग़ात है
वर्ना मै क्या हूँ क्या मेरी औक़ात है

गर है जन्नत ज़मीं पे तो बस है यहीं
आप हम है,ग़ज़ल है,हसीं रात है

मेरे आंगन जो बरसे फ़क़त आब है
तेरे आंगन जो बरसे वो बरसात है

(इसी क़ाफ़िए का एक और शेर)

मेरी आँखों में छाए घटा शर्म की
तेरी आँखों में रिमझिम है बरसात है

मैंने देखे है लाखो सुख़नवर मगर
आपकी बात बस आपकी बात है

हम अदीबो का मज़हब फ़क़त प्यार है
हम सभी की फ़क़त एक ही ज़ात है

तुम से मिलते हुए अब भी आये "हया"
ऐसा लगता है पहली मुलाक़ात है -


बेलौस -बिना किसी लालच के
आब-पानी
दास्ताने-मुख़्तसर -छोटी कहानी
सुख़नवर-अदब नवाज़
रूदाद-दुःख भरी कहानी

Tuesday, June 29, 2010

मेरे पड़ौसी - पेड़, परिंदे और पुलिस

जी हाँ, मैं पेड़ों की, परिंदों की और पुलिस की पड़ौसन हूँ, दूसरे अल्फाज़ में ये सब मेरे पड़ौसी हैं. कैसे? वो ऐसे कि ओशिवरा पुलिस स्टेशन के ठीक पीछे मेरा घर है और मेरे घर के ठीक सामने अनगिनत हरे-भरे पेड़ों का झुरमुट है. ख़ाली पड़ी ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाये ये पेड़ पिछले दस सालों में मेरी आँखों के सामने जवान हुए हैं. पौधों से पेड़ बन कर इन्होने मेरे चौथे माले पर बने फ्लैट को भी अपने क़द के सामने बौना बना दिया है. उन पर महकते पीले-पीले फूलों को देख कर मेरी सुब्ह होती है और उन पर चहकते नन्हें नन्हें परिंदों को देख कर मेरी शाम होती है और रात गुज़रती है उनके रहस्यमय सायों और उनसे छन कर आती पुलिस स्टेशन की झिलमिलाती रौशनी से. रात को खिड़की में बैठ कर ये गुमान होता है मानो साऊथ अफ्रीका के किसी मिनी जंगल में बैठी हूँ. इतना सुकून, शांति और वो भी मुंबई जैसे महानगर में?

इन सब की पड़ौसन बन कर बहुत ख़ुश थी मैं -बहुत ख़ुश . ये शायराना माहौल छोड़ कर कहीं और शिफ्ट होने का दिल ही नहीं चाहता था गो कि मकान बदलना कुछ दुश्वारियों की वजह से मेरे लिए ज़रूरी भी था लेकिन नहीं जा सकी.

लेकिन ये क्या ? अचानक पांच जून को मेरी नींद टूटती है मशीनों के कानफोड़ू शोर से; उत्सुकता वश जब खिड़की के बाहर झांकती हूँ तो कलेजा मुंह को आ जाता है. मशीनों से इन पेड़ों को काटा जा रहा था और जलाया जा रहा था.

चरमराकर गिरते हुए पेड़ों को देख कर अचानक यूँ महसूस हुआ मानो किसी ने ज़मीन का ज़बरन गर्भपात करवा दिया हो-क्या इनमें भी कन्या भ्रूण-हत्या का चलन है या हिन्दू के हाथ से बोये पौधे ने किसी मुस्लिम के हाथ से बोये पेड़ को नफ़रत की बलि चढ़ा दिया है? या इनमें भी मराठी-हिंदी भाषाओँ को लेकर झगडा हुआ है? और फिर धू-धू जलते हुए उन पेड़ों के शवों को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे किसी नव यौवना को दहेज की आग में जला दिया गया हो. खुद से ही सवाल करने लगी कि ये इंसान तो नहीं हैं फिर ज़ात-पात-मज़हब-फिरक़ापरस्ती दंगों-बुराइयों से भी दूर हैं तो फिर आख़िर किस बिना पर इनका इतनी बेरहमी से क़त्ल किया जा रहा है और वो भी आज? चौंक पड़ती हूँ जब अख़बार पर नज़र पड़ती है कि आज "विश्व पर्यावरण दिवस" है. टी.वी. पर इस विषय पर आयोजित विश्व सम्मलेन की बड़ी-बड़ी ख़बरें प्रसारित की जा रहीं हैं ! वाह क्या विडंबना है कि ठीक आज ही के दिन मेरे पड़ौसी पेड़ जो कि प्रकृति और पर्यावरण के सुधारक है ( जैसे इंसानी समाज में समाज सुधारक होते हैं ) ना जाने किस परियोजना की भेंट चढ़ रहे हैं ! वाह !

परिंदे अपना आशियाना उजड़ते देख फड़फड़ा रहे हैं-देखी नहीं जा रही उनकी बैचैनी-मालूम है कि परिंदे हैं-कहीं और घरौंदा बना ही लेंगे लेकिन मैं? काश परिंदे की तरह अपनी मन पसंद लोकेशन और शाख़ तलाश पाती. तो क्या करूँ ? पुलिस में शिकायत करूँ कि मेरे पड़ौसियों के साथ नाइन्साफ़ी हो रही है, ज़ुल्म हो रहा है , पर पुलिस भी क्या करेगी ! बेचारी सरकार और उसकी नीतियों के सामने कभी-कभी बहुत बेबस हो जाती है. और जब पुलिस ही कुछ नहीं कर पाती तो " मैं" आम जनता और ये बेबस मूक पेड़-परिंदे और चरिंदे क्या कर पाएंगे?

अरे जनाब ये तो सरकारी नीतियों और प्रकृति की जंग है ! और ये जो इंसानियत का पेड़ कटता जा रहा है ; मुहब्बत के परिंदे छटपटा रहे हैं-रिश्तों का पर्यावरण ही प्रदूषित होता जा रहा है-उसको रोकने का कोई उपाय है हमारे पास? ना हमारी नीयत में हरियाली, न जज़्बातों की मिटटी में नमी, न फ़र्ज़ के पौधों की सिंचाई ; फ़क़त स्वार्थ और अपनी महत्वाकांक्षाओं की फ़स्ल की बुवाई और उस पर ख़ामोश हमारी रूह की पुलिस-ठीक वैसे ही जैसे मेरी पड़ौसन ओशिवरा पुलिस तो ज़मीन के पेड़ और यकजहती के पेड़ कटते ही रहेंगे और प्रदूषित होता रहेगा धरती और मानवता का पर्यावरण और जारी रहेगा धरती पर क़ुदरत का क़हर (भूकंप, तूफ़ान.सूखा) और इंसानियत पर बुराइयों का क़हर (भ्रष्टाचार , दंगे-दहशतगर्दी) .

उधर मशीनों का शोर, इधर परिंदों की चीख़ें और मेरे भीतर मचा है सवालात का अजीब कोलाहल;

क्यूँ बुलडोज़र मंगाए जा रहे हैं
शजर क्यूँ फिर गिराए जा रहे हैं

इन्हें कटता हुआ यूँ देख कर के
परिंदे तिलमिलाए जा रहे हैं

मशीनों के मुक़ाबिल पेड़ क्या हैं
कि जब कोह तक कटाए जा रहे हैं

मेरी मुंबई है जैसी भी, भली है
ये क्यूँ शंघई बनाये जा रहे हैं

जिधर देखो इमारत का समंदर
कि बादल बौख़लाये जा रहे हैं

ये पीले गुल जो कल मुस्का रहे थे
अजब मातम मनाये जा रहे हैं

कलेजा मुंह को मेरे आ रहा है
कली के शव जलाए जा रहे हैं

हवा की बद्दुआ, मौसम के नाले
ज़मी को तमतमाए जा रहे हैं

परिंदे, पेड़, हरियाली 'हया ' सब
तेरे हमसाये 'हाय' जा रहे हैं

कोह : पहाड़, नाले : आहें, हमसाये : पडौसी


Wednesday, June 2, 2010

मैं एक तन्हा जज़ीरा पा लूं


मेरी जबीं पे वो ज़ख्म देगा तो खून से तर ग़ज़ल कहूँगी
अगर लगाएगा सुर्ख़ बिंदी मैं सज संवर कर ग़ज़ल कहूँगी

खमोशियों के समन्दरों का ज़रा कनारा तो ढूँढने दो
मैं एक तन्हा जज़ीरा पा लूं वहीँ पहुंचकर ग़ज़ल कहूँगी

ए मीरे -मजलिस तेरी सदारत क़ुबूल करके कहा है सबने
मगर पसे -अंजुमन है कोई मैं आज जिस पर ग़ज़ल कहूँगी

तबस्सुमों के निक़ाब में तुम छुपा तो लेने दो मुझ को चेहरा
उदासियों को छुपा लिया अब कहो मुक़र्रर ग़ज़ल कहूँगी

उसे मकानों की आरज़ू थी मेरी तमन्ना थी एक घर की
तेरी ज़मीं पे, तेरे मकां पर मैं आज बेघर ग़ज़ल कहूँगी

क़फ़स में अत्तार कब तलक तू रखेगा ख़ुशबू छुपा के मेरी
चटख गयीं जो ये शीशियाँ फिर बिखर बिखर कर ग़ज़ल कहूँगी

तेरी रिफाक़त, तेरी सदाक़त का है तअस्सुर भी हर ग़ज़ल में
अगर तुझे नज्र हों ये ग़ज़लें ज़हे-मुक़द्दर ग़ज़ल कहूँगी

अगरचे महफ़िल की शान भी हूँ वक़ार अपना रखूंगी क़ायम
उसे यकीं है के मैं 'हया' हूँ ,समझ-सँभल कर ग़ज़ल कहूँगी


जबीं = माथा
जज़ीरा = द्वीप
मीरे-मजलिस = मजलिस के मुखिया
सदारत = अध्यक्षता
पसे - अंजुमन = महफिल के पीछे
अत्तार = इत्र बेचने वाला
रिफाक़त = दोस्ती
सदाक़त = सच्चाई
तअस्सुर = असर
वक़ार = इज़्ज़त

Thursday, May 13, 2010

वो कुत्ता पाल सकता है मगर माँ ?

मदर्स डे तो बीत गया, लेकिन सिर्फ तारीख़ के हिसाब से, क्या हर दिन मदर्स डे नहीं होता? हमारा अस्तित्व जिसकी वजह से है - उस माँ के बगैर एक दिन भी सुकून से गुज़रता है ? - क़दम-क़दम पर उस माँ की ज़रुरत महसूस होती है, जिसके क़दमों तले ज़न्नत होने का दावा, ख़ुद ख़ुदा ने किया है. उस अनाथ से पूछो जिसे माँ का आंचल और दूध नसीब न हुआ हो. मैं ये नहीं कहती कि बाप की ज़रुरत और अहमियत माँ से कम है - बिलकुल नहीं, लेकिन ये सच है कि एक बच्चा बाप के बगैर - सिर्फ माँ के साथ बेख़ौफ़ पुरसुकून, खुशहाल, बचपन गुज़ार सकता है लेकिन माँ के बग़ैर वो कितना उदास तन्हा और खुद को सहमा महसूस करता है - वही बता सकता है जो माँ विहीन रहा हो - उसे भगवान् ने सब कुछ दे कर भी जैसे कुछ न दिया हो - दुनिया की तमाम दौलत -रिश्ते-ऐशो-आराम-एक माँ की कमी को पूरा नहीं कर सकते - माँ ना होना शायद सबसे बड़ी बदकिस्मती हो लेकिन मेरी नज़र में सबसे बदक़िस्मत वो है जो जवानी की देहलीज़ पर क़दम रखते ही - गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते ही - 'पति' और 'बाप' बनते ही अपनी माँ से अलग हो दुनिया का सबसे ज़ालिम बेटा बन जाता है.

आज बुजुर्ग माँ-बाप से अलग रहना या उन्हें अलग कर देना महानगरों में एक फैशन बन गया है और बाकि जगहों पर एक 'आदत' - जगह-जगह वृद्धाश्रम खोल दिए गए हैं ताकि बूढ़े माँ -बाप को वहां धकेल कर ये तथाकथिक हाई-फाई, उच्च-ख़ानदानी ऊंचे-ऊंचे ओहदों पर बैठे इंसान स्वछन्द, अय्याश जीवन व्यतीत कर सकें. वही माँ बाप जो हमें एक ख़ास मुक़ाम तक पहुंचाते हैं उन्हें हम उनके आखरी दिनों में एक तन्हा मुक़ाम पर छोड़ आते हैं - धिक्कार है ऐसी औलाद पर, बेटों पर - बहुओं पर.



एक नज़्म ऐसे बेटों पर लानत स्वरुप आप तक
पहुंचा
रही हूँ:-

उसे तन्हा, सिसकता छोड़ जब आया मेरा भाई
मैं बेटी हूँ, मैं अपनी माँ को अपने साथ ले आई

वो बूढ़ी हो गयी, तो अब उसे, इक बोझ लगती है
जवानी, अपने बच्चों के लिए, जिसने थी झुलसाई

है बस अपनी ही बीवी और बच्चों से उसे मतलब
उसी को भूल बैठा है, जो दुनिया में उसे लाई

वो कुत्ता पाल सकता है, मगर माँ बोझ लगती है
उसे कुत्ते ने क्या कुछ भी, वफ़ादारी ना सिखलाई

जो जैसा बीज बोता है, वो फल वैसा ही पाता है
बुढ़ापा तुझपे भी आएगा, क्यूँ भूला ये सच्चाई

तेरा बेटा जो देखेगा, वही तो वो भी सीखेगा
तू अपने वास्ते, हाथों से अपने, खोद ना खाई

जो वृद्धाश्रम में बेटा, छोड़ कर, तुझको चला आये
अगर ज़िंदा रही, पूछेगी तुझसे, तेरी माँ जाई

बता किसके लिए, तूने कमाई थी, यहाँ दौलत
मगर जो अस्ल दौलत फ़र्ज़ की थी, वो तो बिसराई

खुलेगा जब खुदा के बैंक में, खाता तेरा इक दिन
तेरे सर पर, बड़ा कर्ज़ा, चढ़ा होगा मेरे भाई

वो माँ, क़दमों तले जिसके ख़ुदा ने ख़ुद रखी जन्नत
ज़हन्नुम नाम ख़ुद अपने, उसे यूँ छोड़, लिखवाई

जो मन्नत मांगते थे बस हमें बेटा हो, बेटा हो
उन्हें बेटी की क़ीमत अब बुढ़ापे में समझ आई

मैं बेटी हूँ, मैं अपनी माँ को अपने साथ ले आई

ये नज़्म मैंने इन दिनों कई कार्यक्रमों में सुनाई और यकीन जानिये - हर जगह किसी ना किसी बुज़ुर्ग की आँख में दर्द का समंदर लहराता दिखा. उनकी आँखों का पानी मुझे ख़ुशी नहीं बल्कि और दहला गया कि ना जाने ये बुज़ुर्गान किस तकलीफ़ से गुज़र रहे होंगे. उफ़ ! उनके बच्चे ना जाने उनके साथ क्या सुलूक करते होंगे.

मेरे भाइयों अगर ज़रा भी इंसानियत और ख़ुदा का खौफ़ बाक़ी है तो अपने बूढ़े वाल्दैन को अकेला ना छोड़ने की कसम खाईये और वो माँ-बाप जो अभी जवान हैं -सिर्फ बेटों की तमन्ना मत कीजिये -बेटियों पर भी भरोसा कीजिये और वो ? जो जन्म से पहले ही बेटियों को मरवा डालते हैं -मेरे इस दावे पर यकीन कीजिए कि आज बेटों से ज़्यादा बेटियां माँ -बाप की देखभाल करती है और काम आती है.

जो अपने घरों में जानवर पाल सकते हैं, माँ -बाप को नहीं वो क्या किसी शैतान ,मुजरिम ,ज़ालिम ,कातिल ,या आतंकवादी से कम गुनहगार हैं ?

"वो कुत्ता पाल सकता है मगर माँ बोझ लगती है"

लानत है...लानत है....लानत है...

Thursday, April 1, 2010

और सब कुछ ठीक है ?


आज एक अप्रैल है ---अप्रैल फूल यानि बेवकूफ़ बनाने का दिन ...लेकिन हम तो सालों से हर दिन किसी ना किसी मुद्दे पर बुद्धू बनते रहे हैं ;जब हालात कुछ और होते हैं और हकीक़त कुछ और ,,,,,और फिर भी कहा यही जाता है कि सब कुछ ठीक है .........क्या वाक़ई ....
और सब कुछ ठीक है ?

मुल्क में दंगा हुआ है, और सब कुछ ठीक है
आदमी नेता हुआ है, और सब कुछ ठीक है ?

ये गनीमत है हवा खाते हो अब भी मुफ़्त में
प्याज़ बस महंगा हुआ है, और सब कुछ ठीक है ?

घर ग़रीबों के गिरें क्या फ़र्क़ बिल्डर को पड़े
आदमी से धन बड़ा है, और सब कुछ ठीक है ?

रोज़ इज्ज़त लुट रही है लड़कियों की रेल में
रोज़ इंसां कट रहा है, और सब कुछ ठीक है ?

मेरे चेहरे पर उदासी ?बात करते हैं जनाब ?
आंख से पानी बहा है, और सब कुछ ठीक है ?

बस ज़रा तौहीन ,थोड़ी तल्खियाँ ,तकलीफ 'बस'
मेरे हाथों में लिखा है, और सब कुछ ठीक है ?

बस अना,खुद्दारियां छोड़ीं ना छोड़ा अपना घर
बेहयाई में 'हया' है, और सब कुछ ठीक है ?

Monday, March 8, 2010

महिला दिवस पर मेरी एक गुज़ारिश

मेरी तमन्ना है की हर हिन्दुस्तानी इस पोस्टर को पढ़े और इसे अमल में लाये



साफ़ साफ़ पढने के लिए: आप मेहरबानी करके इस पोस्टर पर क्लिक करें और जितने लोगों तक मेरी ये गुज़ारिश पहुंचा सकें पहुंचाएं...मैं तहे दिल से आप सब की शुक्रगुज़ार रहूंगी.

Wednesday, March 3, 2010

होली और महिला दिवस पर मेरे ज़ज्बात


करूँ क्या खेल कर होली ?

दिलों में फ़र्क़ हो तो फिर करूँ क्या खेल कर होली
सजा दो प्यार के रंगों से हिन्दुस्तान की डोली
जलादो होलिका ज़ुल्मो-सितम ,नफ़रत की फिर देखो
ख़ुशी के रंग से भर जायेगी हर शख्स की झोली

सात शेर ,सात रंग


[१] अना का रंग ;

मैं जो तलवार उठा लुंगी तो डर जाओगे
औ अगर प्यार से बोलूंगी तो मर जाओगे

[२] श्रद्धा का रंग ;

तुम बुरा करके ज़माने में भले बन जाओ
उसकी नज़रों में बुरा बनके किधर जाओगे

[३]अफ़सोस का रंग ;

ख़ुदकुशी करते हैं हमको जो खिलाकर रोटी
उन किसानों का जो सोचोगे सिहर जाओगे

[४] भेडचाल का रंग ;

इस तरफ आई है दुनिया तो इधर आये हो
उस तरफ जायेगी दुनिया तो उधर जाओगे

[५] यक़ीन का रंग ;

तुम जो तहज़ीब के आईने में देखो ख़ुद को
मेरा दावा है कि इक रोज़ संवर जाओगे

[६] तखलीक का रंग ;

खूब पंछी कि तरह उड़ लो गगन में फिकरों
लफ्ज़ के जाल बिछादूं तो उतर जाओगे

[७] सलाह का रंग ;

हिंद में रह के भी हिंदी से बग़ावत ए 'हया'
अपने घर को ही जो तोड़ोगे बिखर जाओगे .

आशा करती हूँ कि ये नए रंग आपको पसंद आयेंगे ;चाहती तो थी कि वही लाल .पीले .काले ....सातों रंग अपने ब्लॉग पर लगा दूं मगर ना जाने कहाँ ये रंग मेरी कलम मेरे हाथों में थमा गयी और मैं आप सभी अदीबों को इन से रंगने आ गयी हालाँकि सोच तो यही रही थी कि ............ करूँ क्या खेल कर होली ?



हज़रात, महिला दिवस भी क़रीब है ,इन दिनों मैं हर मौक़े पर देर से पहुंची हूँ लेकिन इस मौक़े पर सबसे पहले पहुंचना चाहती हूँ इसलिए एक ग़ज़ल और पोस्ट कर रही हूँ .वैसे तो मैं 'ये दिवस 'और 'वो दिवस ' पर यक़ीन नहीं करती क्योंकि हर दिवस हमारा है पर जैसे परीक्षा के दिनों में विद्यार्थी ज़्यादा गौर से पढ़ते हैं वैसे ही ये सब दिवस एक ख़ास दिन इन विषयों और रिश्तों पर अपनी ओर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं ;फाएदा नहीं है तो नुक़सान भी क्या है ?अलबत्ता कुछ बहस मुबाहिसे ,प्रदर्शन ,गोष्ठियां ,सुझावों की फहरिस्त ,महिला संगठनों के औचित्य ...इन सबको देखने ,सुनने ,समझने ,चिंतन करने का एक मौक़ा और मिल जाता है और अदब को छोड़ कर हर फील्ड की नुमायन्दगी करने वाली महिलाओं को सम्मान और पुरस्कार भी मिल जाता है ,क्योंकि अदब नंगा नहीं है ,सियासी नहीं है ,मसालेदार नहीं है ,ग्लैमरस नहीं है ,बदनाम नहीं है इसलिए मीडिया का ,सरकार का ,बिग बॉस का ध्यान कम ही खींच पाता है ;फिर भी अदब अदब है ,अदीब अदीब हैं इसलिए आला हैं ,इसे मैं अपनी खुशकिस्मती समझूँ या लोगों की सोच में आ रहा बदलाव या आपकी दुआओं का असर कि इस बार महिला दिवस पर 'एक शाम ,लता हया के नाम ', जश्ने लता हया अवामी राय द्वारा आयोजित किया जा रहा है ,इस मौक़े पर एक शायेरात का मुशायेरा भी रखा गया है ,जिसकी निज़ामत भी मेरे ही ज़िम्मे है ,लोगों मुहब्बतें मुझसे ये सब करवाना चाह रही हैं

वर्ना मैं क्या हूँ ,क्या मेरी औक़ात है ? अल्लाह का करम है ,उसकी सौग़ात है ,

मैं तो इस दिन को दो सालों से 'मां और बहिन की गालियों के खिलाफ एक अभियान 'के तौर पर मना रही हूँ ,थोड़ी बहुत कामयाबी भी मिलती है जब एक भी शख्स ये गाली ना देने की क़सम खाता है .नामुमकिन है मगर हर बुराई के ख़िलाफ़ एक आवाज़ तो उठानी ही पड़ती है ,तो कोशिश जारी है ,सिर्फ इसी दिन नहीं बल्कि हर दिन मैं अपने आस-पास के गालिनुमां माहौल को मिटाने की कोशिश करती हूँ ,कॉलेज के प्रोग्राम्स में और हर कार्यक्रम में कुछ पेम्फलेट्स बाँट कर आती हूँ ;बहुत लोगों ने और बच्चों ने मुझे कागज़ पर लिख कर दिया है,क़सम खायी है की भविष्य में ये गालियाँ नहीं देंगे ,मैं जहाँ भी काम करती हूँ अपने सामने इनका इस्तेमाल करने वालों को टोक देती हूँ ,आप सबका भी समर्थन चाहती हूँ ;जब हम मां और बहिनों को गाली बनाना और समझना छोड़ देंगे ,तभी सच्चा महिला दिवस होगा .इन पाक रिश्तों और लफ़्ज़ों को गाली की तरह इस्तेमाल करना कहाँ का अदब और तहज़ीब है ?तभी तो कहती हूँ कि समाज जिस दिन सच्चे दिल से अदब और अदीबों से जुड़ेगा ,सभ्य हो जाएगा ,अच्छाई कम आकर्षित करती है लेकिन फिर भी अच्छाई अटल है,बुराई सिर्फ बुराई है ;

बुरे हैं जो शराफ़त का कभी दम ही नहीं भरते
ख़ुदा की ज़ात से भी जो कभी हरगिज़ नहीं डरते
जिन्हें हो प्यार बहिनों से औ माओं से भी निस्बत हो
ज़बां को गालियों से वो सियाह अपनी नहीं करते

पेम्फलेट्स भी आप तक पहुंचा दूँगी ,मेरा साथ दीजिये .चाहती तो ये भी हूँ कि काश आप सब मेरे सम्मान समारोह में शामिल हों और अपनी दुआओं से नवाज़ें;आप सबकी कमी भी खलेगी ;जानती हूँ नहीं आ पाएंगे मगर मैं फिर भी मुन्तज़िर रहूंगी और यही कहूँगी ;

तू अगर प्यार से सुन ले तो ग़ज़ल हो जाऊं
एक नाज़ुक सा मैं शफ्फाफ़ कँवल हो जाऊं

जब भी तू प्यार से देखे है मुसलसल मुझ को
ताज से और हसीं ताजमहल हो जाऊं

तेरे माथे कि शिकन हूँ तो मैं शर्मिंदा हूँ
बड़ी मुश्किल में हूँ हंस दे तो सहल हो जाऊं

तेरा साया जो मेरे जिस्म पे पड़ जाता है
मैं तो मीरा का कि लैला का बदल हो जाऊं

जिस घड़ी तुम को हुई थी जी मुहब्बत हम से
दिल यही चाहे है फिर से वही पल हो जाऊं

तू मुझे वक़्त के क़ानून से रख दूर ज़रा
मैं नहीं चाहती कि गुज़रा हुआ कल हो जाऊं

आईना देख के शर्माए ना तुझ से ऐ 'हया'
इतना सिंगार ना करना कि मैं छल हो जाऊं .

अपनी तमाम बहिनों को महिला दिवस पर अपने बाअदब,बाहया वुजूद के होने का एहसास हो ,इन्ही शुभकामनाओं के साथ ......

'' औरत होने पर फख्र करो ''

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