
करूँ क्या खेल कर होली ?
सजा दो प्यार के रंगों से हिन्दुस्तान की डोली
जलादो होलिका ज़ुल्मो-सितम ,नफ़रत की फिर देखो
ख़ुशी के रंग से भर जायेगी हर शख्स की झोली
सात शेर ,सात रंग
[१] अना का रंग ;
मैं जो तलवार उठा लुंगी तो डर जाओगे
औ अगर प्यार से बोलूंगी तो मर जाओगे
[२] श्रद्धा का रंग ;
तुम बुरा करके ज़माने में भले बन जाओ
उसकी नज़रों में बुरा बनके किधर जाओगे
[३]अफ़सोस का रंग ;
ख़ुदकुशी करते हैं हमको जो खिलाकर रोटी
उन किसानों का जो सोचोगे सिहर जाओगे
[४] भेडचाल का रंग ;
इस तरफ आई है दुनिया तो इधर आये हो
उस तरफ जायेगी दुनिया तो उधर जाओगे
[५] यक़ीन का रंग ;
तुम जो तहज़ीब के आईने में देखो ख़ुद को
मेरा दावा है कि इक रोज़ संवर जाओगे
[६] तखलीक का रंग ;
खूब पंछी कि तरह उड़ लो गगन में फिकरों
लफ्ज़ के जाल बिछादूं तो उतर जाओगे
[७] सलाह का रंग ;
हिंद में रह के भी हिंदी से बग़ावत ए 'हया'
अपने घर को ही जो तोड़ोगे बिखर जाओगे .
आशा करती हूँ कि ये नए रंग आपको पसंद आयेंगे ;चाहती तो थी कि वही लाल .पीले .काले ....सातों रंग अपने ब्लॉग पर लगा दूं मगर ना जाने कहाँ ये रंग मेरी कलम मेरे हाथों में थमा गयी और मैं आप सभी अदीबों को इन से रंगने आ गयी हालाँकि सोच तो यही रही थी कि ............ करूँ क्या खेल कर होली ?
हज़रात, महिला दिवस भी क़रीब है ,इन दिनों मैं हर मौक़े पर देर से पहुंची हूँ लेकिन इस मौक़े पर सबसे पहले पहुंचना चाहती हूँ इसलिए एक ग़ज़ल और पोस्ट कर रही हूँ .वैसे तो मैं 'ये दिवस 'और 'वो दिवस ' पर यक़ीन नहीं करती क्योंकि हर दिवस हमारा है पर जैसे परीक्षा के दिनों में विद्यार्थी ज़्यादा गौर से पढ़ते हैं वैसे ही ये सब दिवस एक ख़ास दिन इन विषयों और रिश्तों पर अपनी ओर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं ;फाएदा नहीं है तो नुक़सान भी क्या है ?अलबत्ता कुछ बहस मुबाहिसे ,प्रदर्शन ,गोष्ठियां ,सुझावों की फहरिस्त ,महिला संगठनों के औचित्य ...इन सबको देखने ,सुनने ,समझने ,चिंतन करने का एक मौक़ा और मिल जाता है और अदब को छोड़ कर हर फील्ड की नुमायन्दगी करने वाली महिलाओं को सम्मान और पुरस्कार भी मिल जाता है ,क्योंकि अदब नंगा नहीं है ,सियासी नहीं है ,मसालेदार नहीं है ,ग्लैमरस नहीं है ,बदनाम नहीं है इसलिए मीडिया का ,सरकार का ,बिग बॉस का ध्यान कम ही खींच पाता है ;फिर भी अदब अदब है ,अदीब अदीब हैं इसलिए आला हैं ,इसे मैं अपनी खुशकिस्मती समझूँ या लोगों की सोच में आ रहा बदलाव या आपकी दुआओं का असर कि इस बार महिला दिवस पर 'एक शाम ,लता हया के नाम ', जश्ने लता हया अवामी राय द्वारा आयोजित किया जा रहा है ,इस मौक़े पर एक शायेरात का मुशायेरा भी रखा गया है ,जिसकी निज़ामत भी मेरे ही ज़िम्मे है ,लोगों मुहब्बतें मुझसे ये सब करवाना चाह रही हैं
वर्ना मैं क्या हूँ ,क्या मेरी औक़ात है ? अल्लाह का करम है ,उसकी सौग़ात है ,
मैं तो इस दिन को दो सालों से 'मां और बहिन की गालियों के खिलाफ एक अभियान 'के तौर पर मना रही हूँ ,थोड़ी बहुत कामयाबी भी मिलती है जब एक भी शख्स ये गाली ना देने की क़सम खाता है .नामुमकिन है मगर हर बुराई के ख़िलाफ़ एक आवाज़ तो उठानी ही पड़ती है ,तो कोशिश जारी है ,सिर्फ इसी दिन नहीं बल्कि हर दिन मैं अपने आस-पास के गालिनुमां माहौल को मिटाने की कोशिश करती हूँ ,कॉलेज के प्रोग्राम्स में और हर कार्यक्रम में कुछ पेम्फलेट्स बाँट कर आती हूँ ;बहुत लोगों ने और बच्चों ने मुझे कागज़ पर लिख कर दिया है,क़सम खायी है की भविष्य में ये गालियाँ नहीं देंगे ,मैं जहाँ भी काम करती हूँ अपने सामने इनका इस्तेमाल करने वालों को टोक देती हूँ ,आप सबका भी समर्थन चाहती हूँ ;जब हम मां और बहिनों को गाली बनाना और समझना छोड़ देंगे ,तभी सच्चा महिला दिवस होगा .इन पाक रिश्तों और लफ़्ज़ों को गाली की तरह इस्तेमाल करना कहाँ का अदब और तहज़ीब है ?तभी तो कहती हूँ कि समाज जिस दिन सच्चे दिल से अदब और अदीबों से जुड़ेगा ,सभ्य हो जाएगा ,अच्छाई कम आकर्षित करती है लेकिन फिर भी अच्छाई अटल है,बुराई सिर्फ बुराई है ;
बुरे हैं जो शराफ़त का कभी दम ही नहीं भरते
ख़ुदा की ज़ात से भी जो कभी हरगिज़ नहीं डरते
जिन्हें हो प्यार बहिनों से औ माओं से भी निस्बत हो
ज़बां को गालियों से वो सियाह अपनी नहीं करते
पेम्फलेट्स भी आप तक पहुंचा दूँगी ,मेरा साथ दीजिये .चाहती तो ये भी हूँ कि काश आप सब मेरे सम्मान समारोह में शामिल हों और अपनी दुआओं से नवाज़ें;आप सबकी कमी भी खलेगी ;जानती हूँ नहीं आ पाएंगे मगर मैं फिर भी मुन्तज़िर रहूंगी और यही कहूँगी ;
तू अगर प्यार से सुन ले तो ग़ज़ल हो जाऊं
एक नाज़ुक सा मैं शफ्फाफ़ कँवल हो जाऊं
जब भी तू प्यार से देखे है मुसलसल मुझ को
ताज से और हसीं ताजमहल हो जाऊं
तेरे माथे कि शिकन हूँ तो मैं शर्मिंदा हूँ
बड़ी मुश्किल में हूँ हंस दे तो सहल हो जाऊं
तेरा साया जो मेरे जिस्म पे पड़ जाता है
मैं तो मीरा का कि लैला का बदल हो जाऊं
जिस घड़ी तुम को हुई थी जी मुहब्बत हम से
दिल यही चाहे है फिर से वही पल हो जाऊं
तू मुझे वक़्त के क़ानून से रख दूर ज़रा
मैं नहीं चाहती कि गुज़रा हुआ कल हो जाऊं
आईना देख के शर्माए ना तुझ से ऐ 'हया'
इतना सिंगार ना करना कि मैं छल हो जाऊं .
अपनी तमाम बहिनों को महिला दिवस पर अपने बाअदब,बाहया वुजूद के होने का एहसास हो ,इन्ही शुभकामनाओं के साथ ......
'' औरत होने पर फख्र करो ''
aapka karykram safal ho ye dua haiaur safal hoga ye vishvas hai........
ReplyDeleteAasheesh sadaiv sath hai............
Pahala rang AAN se tatpary raha hoga type ANA ho gaya hai. Vaise urdu jyada aatee nahee agar ana koi shavd ho to sorry........
All the best.........
वाह ! कमाल कर दिया आपने , दिल को नहीं रूह को छुआ है आपने. 8th March International womens day . हम तो आपके कलाम के मुरीद थे ही अब आपकी शख्सियत से भी उन्सियत सी हो गई. Really hatts of you. हम अक्षरशा: आपके साथ है.
ReplyDeleteमेरी नजर में यक़ीनन आप सबसे पहले और सबसे ऊपर हैं - आपको और आपकी कलम को मेरा सजदा.
ReplyDeleteतू मुझे वक़्त के क़ानून से रख दूर ज़रा
ReplyDeleteमैं नहीं चाहती कि गुज़रा हुआ कल बन जाऊं
आईना देख के शर्माए ना तुझ से ऐ 'हया'
इतना सिंगार ना करना कि मैं छल बन जाऊं .
Aisa gazab likhtee hain aap ki,mai nishabd ho jatee hun!
जमीनी रचनाएँ अक्सर झकझोर देती है
ReplyDeleteसुन्दर
'एक शाम ,लता हया के नाम ' waah di.. lekin main kaise aaun samman samaroh me??? :( par dua karoonga ki aise samman aapko har roz milen.. aapki gazal to apne aap me nayab tohfa hoti hi hain.. lekin holi ke baad aayeen aap.. ye galat baad hai.. hope so ki ya to book aapke hath me hogi ya 1-2 din me pahunchne hi wali hogi..
ReplyDeleteJai Hind..
aaina le kr hmeshan sath main chlta rha
ReplyDeleteapni surt ko hmesha dekh kr chlta rha
kyon ki mujh sa aur bd soort koi tha hi nhi
is liye hi aaine ko dekh kr chlta rha
dr.ved vyathit
मोहतरमा लता ’हया’ साहिबा, आदाब
ReplyDeleteसबसे पहले होली की मुबारकबाद...और
शुक्रिया...इतना अच्छा कलाम पेश करने के लिये
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ख़ुदकुशी करते हैं हमको जो खिलाकर रोटी
उन किसानों का जो सोचोगे सिहर जाओगे
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सबसे गहरा....शेर......वाक़ई अन्नदाता कहे जाने वाले
किसान को खुदकुशी करनी पड़े,
तो पूरी इंसानियत के लिये शर्मसार कर देने वाली बात है....
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तुम जो तहज़ीब के आईने में देखो ख़ुद को
मेरा दावा है कि इक रोज़ संवर जाओगे....
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बेशक.....तहज़ीब शख़्सियत को निखार देती है...
महिला दिवस से संबंधित लेख और अश’आर...
दोनों में आपका रंग है.....मुबारकबाद और दाद कबूल फ़रमायें.
एक शब्द में कहें तो
ReplyDelete’अद्भुत’
मैं जो तलवार उठा लुंगी तो डर जाओगे
औ अगर प्यार से बोलूंगी तो मर जाओगे
-वाह!!
सभी शेर एक के बाद एक-गज़ब!!
महिला दिवस की बधाई स्वीकारें.
आप सबके कमेन्टस से अभिभूत हूँ लेकिन कुछ कहना चाहती हूँ ;
ReplyDelete१- अपनत्व जी लफ्ज़ अना ही मैंने लिखा है आन नहीं जिसका मतलब गुरुर है लेकिन ये positive वे में इस्तेमाल किया गया है यानि की औरत दोनों तरीके से जीत सकती है ;रज़िया बनकर भी और लैला बनकर भी ;
२-दीपक भाई मैंने तो पहले ही कह दिया था की होली खेलना नहीं चाहती थी ...करूँ क्या ..इसका जवाब है लेकिन कलम रंग बिखेर गयी तो क्या करूँ इसलिए देरी से पोस्ट की और हाँ तुम्हारी किताब मिल गयी ..शुक्रिया
तलवार से ना डरे मगर आपके प्यार से जरुर मरेंगे ...
ReplyDeleteक्या बात है ...
ये सारे रंग बहुत हसीं है ...!!
lata ji,
ReplyDeletepadhne ke baad aisa laga ki jaise kisi ne jhakjhor diya ho...
sashakt rachna ke liye badhaayi.
आपके जज़्बात सर आँखों पर!
ReplyDeleteआपके प्रयासों को नमन करता हूँ.
सभी अशआर दिल को छूते हैं, मन को झकझोरते हैं.
आप बस बनी रहिये.. दुआ है, और हाँ कोई सहयोग चाहिए तो याद भर कर लिजयेगा.
" ek se badhker ek "
ReplyDelete" aapko hamari aur se subhkamnaye aur is behatarin post ke liye dhanywad "
---- eksacchai { AAWAZ }
lata di aapke saaton rang mann ko sarobar kar gaye.aur ye sher bahut pyara laga-
ReplyDeleteजिस घड़ी तुम को हुई थी जी मुहब्बत हम से
दिल यही चाहे है फिर से वही पल हो जाऊं shukriya.
lata haya ji aap ka ye blog mai roz dekhti hu
ReplyDeleteaap ne jo mahila diwas ke bare mai likhha bakai ma bahot achha laga,aap ke is abhiyan mai mai bhi aap ke sath hu aap ko bahot bahot sukriya
dikshya
sheeroshayari.blogspot.com
लता जी,
ReplyDeleteआपको ये लिखने की क्या जरूरत महसूस हुई की हम आपका साथ दें. हम तो हमेशा आपके साथ हैं आप अपने कार्य में सफलता पायें यही इश्वर से प्रार्थना है, और आपकी ग़ज़ल हमेशा की तरह दिल के अन्दर तक उतर गयी है
लता दी को नमस्कार,
ReplyDeleteक्या खूब होली में रंग बिखेरी है आपने अपने कलम से ... सच कहूँ तो सार्थक पोस्ट...
बधाई कुबूलें,,
अर्श
बेहतरीन प्रस्तुति के लिये बधाई ।
ReplyDeleteLata ji, ishvar se yahi prarathana karati hun aur ummid bhi yahi hai ki aap safalta ke aasman par apana parcham jarur jarur faharayengi.bahut dinon se mera blog aapki raaha dekh raha hai.
ReplyDeletepoonam
[३]अफ़सोस का रंग ;
ReplyDeleteख़ुदकुशी करते हैं हमको जो खिलाकर रोटी
उन किसानों का जो सोचोगे सिहर जाओगे
[५] यक़ीन का रंग ;
तुम जो तहज़ीब के आईने में देखो ख़ुद को
मेरा दावा है कि इक रोज़ संवर जाओगे
[६] तखलीक का रंग ;
खूब पंछी कि तरह उड़ लो गगन में फिकरों
लफ्ज़ के जाल बिछादूं तो उतर जाओगे
हया साहिबा, आपका ग़ज़ल पेश करने का यह अंदाज आलाओनिराला है।
क्या बात है ...बहुत खूब
तू मुझे वक़्त के क़ानून से रख दूर ज़रा
ReplyDeleteमैं नहीं चाहती कि गुज़रा हुआ कल हो जाऊं
.............बहुत खूबसूरत...
दिलों में फ़र्क़ हो तो फिर करूँ क्या खेल कर होली
ReplyDeleteसजा दो प्यार के रंगों से हिन्दुस्तान की डोली
जलादो होलिका ज़ुल्मो-सितम ,नफ़रत की फिर देखो
ख़ुशी के रंग से भर जायेगी हर शख्स की झोली
awaysome ,exceelent .......koi javab nahi ,laajavab
suraj ko diya dikhane vali baat hogi in ahsaason ki tariif karna
बहुत सुन्दर शेर हैं सारे के सारे...पूरी ग़ज़ल सुन्दर है ....... पहले होली पे लिखी ग़ज़ल ....वास्तविकता के हर रंग को दिखा गयी और फिर औरत पैर लिखी ग़ज़ल जैसे एक खूबसूरत एहसास की तरह सामने आ गयी .....आपकी लेखन शैली बहुत अच्छी लगी .......
ReplyDeleteख़ुदकुशी करते हैं हमको जो खिलाकर रोटी
उन किसानों का जो सोचोगे सिहर जाओगे
ये शेर किना बेबाक है ... दुःख तो इस बात का है की शायद ही कोई इस बारे में सोचता है !
तू अगर प्यार से सुन ले तो ग़ज़ल हो जाऊं
एक नाज़ुक सा मैं शफ्फाफ़ कँवल हो जाऊं
बहुत सुन्दर और कोमल सा शेर है .... जैसे एक अल्हड़ की मुस्कान !
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteवाह ! कमाल कर दिया आपने , दिल को नहीं रूह को छुआ है आपने.
ReplyDeleteसमझना
एक नारी को
शायद........
मुश्किल ही नहीं,
असंभव है.
नारी,
आग का वह गोला है
जो जला सकती है,
पूरी दुनिया.
नारी,
पानी का सोता है
वह बुझा सकती है,
जिस्म की आग.
नारी,
एक तूफान है
वह मिटा सकती है,
आदमी का वजूद.
नारी,
वरगद की छाया है
वह देती है, थके यात्री को,
दो पल का आराम.
नारी,
एक तवा है
वह खुद जलकर मिटाती है,
दूसरों की भूख.
नारी,
पवित्र गंगा है
वह धोती है सदियों से,
पापियों का पाप.
नारी,
मृग तृष्णा है
जो पग बढ़ाते ही,
चली जाती है दूर.
नारी,
लाजबन्ती है
वह मुरझा जाती है,
छु देने के बाद.
नारी,
सृष्टी है
वह रचती है रोज,
एक नई संसार.