Wednesday, June 2, 2010

मैं एक तन्हा जज़ीरा पा लूं


मेरी जबीं पे वो ज़ख्म देगा तो खून से तर ग़ज़ल कहूँगी
अगर लगाएगा सुर्ख़ बिंदी मैं सज संवर कर ग़ज़ल कहूँगी

खमोशियों के समन्दरों का ज़रा कनारा तो ढूँढने दो
मैं एक तन्हा जज़ीरा पा लूं वहीँ पहुंचकर ग़ज़ल कहूँगी

ए मीरे -मजलिस तेरी सदारत क़ुबूल करके कहा है सबने
मगर पसे -अंजुमन है कोई मैं आज जिस पर ग़ज़ल कहूँगी

तबस्सुमों के निक़ाब में तुम छुपा तो लेने दो मुझ को चेहरा
उदासियों को छुपा लिया अब कहो मुक़र्रर ग़ज़ल कहूँगी

उसे मकानों की आरज़ू थी मेरी तमन्ना थी एक घर की
तेरी ज़मीं पे, तेरे मकां पर मैं आज बेघर ग़ज़ल कहूँगी

क़फ़स में अत्तार कब तलक तू रखेगा ख़ुशबू छुपा के मेरी
चटख गयीं जो ये शीशियाँ फिर बिखर बिखर कर ग़ज़ल कहूँगी

तेरी रिफाक़त, तेरी सदाक़त का है तअस्सुर भी हर ग़ज़ल में
अगर तुझे नज्र हों ये ग़ज़लें ज़हे-मुक़द्दर ग़ज़ल कहूँगी

अगरचे महफ़िल की शान भी हूँ वक़ार अपना रखूंगी क़ायम
उसे यकीं है के मैं 'हया' हूँ ,समझ-सँभल कर ग़ज़ल कहूँगी


जबीं = माथा
जज़ीरा = द्वीप
मीरे-मजलिस = मजलिस के मुखिया
सदारत = अध्यक्षता
पसे - अंजुमन = महफिल के पीछे
अत्तार = इत्र बेचने वाला
रिफाक़त = दोस्ती
सदाक़त = सच्चाई
तअस्सुर = असर
वक़ार = इज़्ज़त

Thursday, May 13, 2010

वो कुत्ता पाल सकता है मगर माँ ?

मदर्स डे तो बीत गया, लेकिन सिर्फ तारीख़ के हिसाब से, क्या हर दिन मदर्स डे नहीं होता? हमारा अस्तित्व जिसकी वजह से है - उस माँ के बगैर एक दिन भी सुकून से गुज़रता है ? - क़दम-क़दम पर उस माँ की ज़रुरत महसूस होती है, जिसके क़दमों तले ज़न्नत होने का दावा, ख़ुद ख़ुदा ने किया है. उस अनाथ से पूछो जिसे माँ का आंचल और दूध नसीब न हुआ हो. मैं ये नहीं कहती कि बाप की ज़रुरत और अहमियत माँ से कम है - बिलकुल नहीं, लेकिन ये सच है कि एक बच्चा बाप के बगैर - सिर्फ माँ के साथ बेख़ौफ़ पुरसुकून, खुशहाल, बचपन गुज़ार सकता है लेकिन माँ के बग़ैर वो कितना उदास तन्हा और खुद को सहमा महसूस करता है - वही बता सकता है जो माँ विहीन रहा हो - उसे भगवान् ने सब कुछ दे कर भी जैसे कुछ न दिया हो - दुनिया की तमाम दौलत -रिश्ते-ऐशो-आराम-एक माँ की कमी को पूरा नहीं कर सकते - माँ ना होना शायद सबसे बड़ी बदकिस्मती हो लेकिन मेरी नज़र में सबसे बदक़िस्मत वो है जो जवानी की देहलीज़ पर क़दम रखते ही - गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते ही - 'पति' और 'बाप' बनते ही अपनी माँ से अलग हो दुनिया का सबसे ज़ालिम बेटा बन जाता है.

आज बुजुर्ग माँ-बाप से अलग रहना या उन्हें अलग कर देना महानगरों में एक फैशन बन गया है और बाकि जगहों पर एक 'आदत' - जगह-जगह वृद्धाश्रम खोल दिए गए हैं ताकि बूढ़े माँ -बाप को वहां धकेल कर ये तथाकथिक हाई-फाई, उच्च-ख़ानदानी ऊंचे-ऊंचे ओहदों पर बैठे इंसान स्वछन्द, अय्याश जीवन व्यतीत कर सकें. वही माँ बाप जो हमें एक ख़ास मुक़ाम तक पहुंचाते हैं उन्हें हम उनके आखरी दिनों में एक तन्हा मुक़ाम पर छोड़ आते हैं - धिक्कार है ऐसी औलाद पर, बेटों पर - बहुओं पर.



एक नज़्म ऐसे बेटों पर लानत स्वरुप आप तक
पहुंचा
रही हूँ:-

उसे तन्हा, सिसकता छोड़ जब आया मेरा भाई
मैं बेटी हूँ, मैं अपनी माँ को अपने साथ ले आई

वो बूढ़ी हो गयी, तो अब उसे, इक बोझ लगती है
जवानी, अपने बच्चों के लिए, जिसने थी झुलसाई

है बस अपनी ही बीवी और बच्चों से उसे मतलब
उसी को भूल बैठा है, जो दुनिया में उसे लाई

वो कुत्ता पाल सकता है, मगर माँ बोझ लगती है
उसे कुत्ते ने क्या कुछ भी, वफ़ादारी ना सिखलाई

जो जैसा बीज बोता है, वो फल वैसा ही पाता है
बुढ़ापा तुझपे भी आएगा, क्यूँ भूला ये सच्चाई

तेरा बेटा जो देखेगा, वही तो वो भी सीखेगा
तू अपने वास्ते, हाथों से अपने, खोद ना खाई

जो वृद्धाश्रम में बेटा, छोड़ कर, तुझको चला आये
अगर ज़िंदा रही, पूछेगी तुझसे, तेरी माँ जाई

बता किसके लिए, तूने कमाई थी, यहाँ दौलत
मगर जो अस्ल दौलत फ़र्ज़ की थी, वो तो बिसराई

खुलेगा जब खुदा के बैंक में, खाता तेरा इक दिन
तेरे सर पर, बड़ा कर्ज़ा, चढ़ा होगा मेरे भाई

वो माँ, क़दमों तले जिसके ख़ुदा ने ख़ुद रखी जन्नत
ज़हन्नुम नाम ख़ुद अपने, उसे यूँ छोड़, लिखवाई

जो मन्नत मांगते थे बस हमें बेटा हो, बेटा हो
उन्हें बेटी की क़ीमत अब बुढ़ापे में समझ आई

मैं बेटी हूँ, मैं अपनी माँ को अपने साथ ले आई

ये नज़्म मैंने इन दिनों कई कार्यक्रमों में सुनाई और यकीन जानिये - हर जगह किसी ना किसी बुज़ुर्ग की आँख में दर्द का समंदर लहराता दिखा. उनकी आँखों का पानी मुझे ख़ुशी नहीं बल्कि और दहला गया कि ना जाने ये बुज़ुर्गान किस तकलीफ़ से गुज़र रहे होंगे. उफ़ ! उनके बच्चे ना जाने उनके साथ क्या सुलूक करते होंगे.

मेरे भाइयों अगर ज़रा भी इंसानियत और ख़ुदा का खौफ़ बाक़ी है तो अपने बूढ़े वाल्दैन को अकेला ना छोड़ने की कसम खाईये और वो माँ-बाप जो अभी जवान हैं -सिर्फ बेटों की तमन्ना मत कीजिये -बेटियों पर भी भरोसा कीजिये और वो ? जो जन्म से पहले ही बेटियों को मरवा डालते हैं -मेरे इस दावे पर यकीन कीजिए कि आज बेटों से ज़्यादा बेटियां माँ -बाप की देखभाल करती है और काम आती है.

जो अपने घरों में जानवर पाल सकते हैं, माँ -बाप को नहीं वो क्या किसी शैतान ,मुजरिम ,ज़ालिम ,कातिल ,या आतंकवादी से कम गुनहगार हैं ?

"वो कुत्ता पाल सकता है मगर माँ बोझ लगती है"

लानत है...लानत है....लानत है...

Thursday, April 1, 2010

और सब कुछ ठीक है ?


आज एक अप्रैल है ---अप्रैल फूल यानि बेवकूफ़ बनाने का दिन ...लेकिन हम तो सालों से हर दिन किसी ना किसी मुद्दे पर बुद्धू बनते रहे हैं ;जब हालात कुछ और होते हैं और हकीक़त कुछ और ,,,,,और फिर भी कहा यही जाता है कि सब कुछ ठीक है .........क्या वाक़ई ....
और सब कुछ ठीक है ?

मुल्क में दंगा हुआ है, और सब कुछ ठीक है
आदमी नेता हुआ है, और सब कुछ ठीक है ?

ये गनीमत है हवा खाते हो अब भी मुफ़्त में
प्याज़ बस महंगा हुआ है, और सब कुछ ठीक है ?

घर ग़रीबों के गिरें क्या फ़र्क़ बिल्डर को पड़े
आदमी से धन बड़ा है, और सब कुछ ठीक है ?

रोज़ इज्ज़त लुट रही है लड़कियों की रेल में
रोज़ इंसां कट रहा है, और सब कुछ ठीक है ?

मेरे चेहरे पर उदासी ?बात करते हैं जनाब ?
आंख से पानी बहा है, और सब कुछ ठीक है ?

बस ज़रा तौहीन ,थोड़ी तल्खियाँ ,तकलीफ 'बस'
मेरे हाथों में लिखा है, और सब कुछ ठीक है ?

बस अना,खुद्दारियां छोड़ीं ना छोड़ा अपना घर
बेहयाई में 'हया' है, और सब कुछ ठीक है ?

Monday, March 8, 2010

महिला दिवस पर मेरी एक गुज़ारिश

मेरी तमन्ना है की हर हिन्दुस्तानी इस पोस्टर को पढ़े और इसे अमल में लाये



साफ़ साफ़ पढने के लिए: आप मेहरबानी करके इस पोस्टर पर क्लिक करें और जितने लोगों तक मेरी ये गुज़ारिश पहुंचा सकें पहुंचाएं...मैं तहे दिल से आप सब की शुक्रगुज़ार रहूंगी.

Wednesday, March 3, 2010

होली और महिला दिवस पर मेरे ज़ज्बात


करूँ क्या खेल कर होली ?

दिलों में फ़र्क़ हो तो फिर करूँ क्या खेल कर होली
सजा दो प्यार के रंगों से हिन्दुस्तान की डोली
जलादो होलिका ज़ुल्मो-सितम ,नफ़रत की फिर देखो
ख़ुशी के रंग से भर जायेगी हर शख्स की झोली

सात शेर ,सात रंग


[१] अना का रंग ;

मैं जो तलवार उठा लुंगी तो डर जाओगे
औ अगर प्यार से बोलूंगी तो मर जाओगे

[२] श्रद्धा का रंग ;

तुम बुरा करके ज़माने में भले बन जाओ
उसकी नज़रों में बुरा बनके किधर जाओगे

[३]अफ़सोस का रंग ;

ख़ुदकुशी करते हैं हमको जो खिलाकर रोटी
उन किसानों का जो सोचोगे सिहर जाओगे

[४] भेडचाल का रंग ;

इस तरफ आई है दुनिया तो इधर आये हो
उस तरफ जायेगी दुनिया तो उधर जाओगे

[५] यक़ीन का रंग ;

तुम जो तहज़ीब के आईने में देखो ख़ुद को
मेरा दावा है कि इक रोज़ संवर जाओगे

[६] तखलीक का रंग ;

खूब पंछी कि तरह उड़ लो गगन में फिकरों
लफ्ज़ के जाल बिछादूं तो उतर जाओगे

[७] सलाह का रंग ;

हिंद में रह के भी हिंदी से बग़ावत ए 'हया'
अपने घर को ही जो तोड़ोगे बिखर जाओगे .

आशा करती हूँ कि ये नए रंग आपको पसंद आयेंगे ;चाहती तो थी कि वही लाल .पीले .काले ....सातों रंग अपने ब्लॉग पर लगा दूं मगर ना जाने कहाँ ये रंग मेरी कलम मेरे हाथों में थमा गयी और मैं आप सभी अदीबों को इन से रंगने आ गयी हालाँकि सोच तो यही रही थी कि ............ करूँ क्या खेल कर होली ?



हज़रात, महिला दिवस भी क़रीब है ,इन दिनों मैं हर मौक़े पर देर से पहुंची हूँ लेकिन इस मौक़े पर सबसे पहले पहुंचना चाहती हूँ इसलिए एक ग़ज़ल और पोस्ट कर रही हूँ .वैसे तो मैं 'ये दिवस 'और 'वो दिवस ' पर यक़ीन नहीं करती क्योंकि हर दिवस हमारा है पर जैसे परीक्षा के दिनों में विद्यार्थी ज़्यादा गौर से पढ़ते हैं वैसे ही ये सब दिवस एक ख़ास दिन इन विषयों और रिश्तों पर अपनी ओर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं ;फाएदा नहीं है तो नुक़सान भी क्या है ?अलबत्ता कुछ बहस मुबाहिसे ,प्रदर्शन ,गोष्ठियां ,सुझावों की फहरिस्त ,महिला संगठनों के औचित्य ...इन सबको देखने ,सुनने ,समझने ,चिंतन करने का एक मौक़ा और मिल जाता है और अदब को छोड़ कर हर फील्ड की नुमायन्दगी करने वाली महिलाओं को सम्मान और पुरस्कार भी मिल जाता है ,क्योंकि अदब नंगा नहीं है ,सियासी नहीं है ,मसालेदार नहीं है ,ग्लैमरस नहीं है ,बदनाम नहीं है इसलिए मीडिया का ,सरकार का ,बिग बॉस का ध्यान कम ही खींच पाता है ;फिर भी अदब अदब है ,अदीब अदीब हैं इसलिए आला हैं ,इसे मैं अपनी खुशकिस्मती समझूँ या लोगों की सोच में आ रहा बदलाव या आपकी दुआओं का असर कि इस बार महिला दिवस पर 'एक शाम ,लता हया के नाम ', जश्ने लता हया अवामी राय द्वारा आयोजित किया जा रहा है ,इस मौक़े पर एक शायेरात का मुशायेरा भी रखा गया है ,जिसकी निज़ामत भी मेरे ही ज़िम्मे है ,लोगों मुहब्बतें मुझसे ये सब करवाना चाह रही हैं

वर्ना मैं क्या हूँ ,क्या मेरी औक़ात है ? अल्लाह का करम है ,उसकी सौग़ात है ,

मैं तो इस दिन को दो सालों से 'मां और बहिन की गालियों के खिलाफ एक अभियान 'के तौर पर मना रही हूँ ,थोड़ी बहुत कामयाबी भी मिलती है जब एक भी शख्स ये गाली ना देने की क़सम खाता है .नामुमकिन है मगर हर बुराई के ख़िलाफ़ एक आवाज़ तो उठानी ही पड़ती है ,तो कोशिश जारी है ,सिर्फ इसी दिन नहीं बल्कि हर दिन मैं अपने आस-पास के गालिनुमां माहौल को मिटाने की कोशिश करती हूँ ,कॉलेज के प्रोग्राम्स में और हर कार्यक्रम में कुछ पेम्फलेट्स बाँट कर आती हूँ ;बहुत लोगों ने और बच्चों ने मुझे कागज़ पर लिख कर दिया है,क़सम खायी है की भविष्य में ये गालियाँ नहीं देंगे ,मैं जहाँ भी काम करती हूँ अपने सामने इनका इस्तेमाल करने वालों को टोक देती हूँ ,आप सबका भी समर्थन चाहती हूँ ;जब हम मां और बहिनों को गाली बनाना और समझना छोड़ देंगे ,तभी सच्चा महिला दिवस होगा .इन पाक रिश्तों और लफ़्ज़ों को गाली की तरह इस्तेमाल करना कहाँ का अदब और तहज़ीब है ?तभी तो कहती हूँ कि समाज जिस दिन सच्चे दिल से अदब और अदीबों से जुड़ेगा ,सभ्य हो जाएगा ,अच्छाई कम आकर्षित करती है लेकिन फिर भी अच्छाई अटल है,बुराई सिर्फ बुराई है ;

बुरे हैं जो शराफ़त का कभी दम ही नहीं भरते
ख़ुदा की ज़ात से भी जो कभी हरगिज़ नहीं डरते
जिन्हें हो प्यार बहिनों से औ माओं से भी निस्बत हो
ज़बां को गालियों से वो सियाह अपनी नहीं करते

पेम्फलेट्स भी आप तक पहुंचा दूँगी ,मेरा साथ दीजिये .चाहती तो ये भी हूँ कि काश आप सब मेरे सम्मान समारोह में शामिल हों और अपनी दुआओं से नवाज़ें;आप सबकी कमी भी खलेगी ;जानती हूँ नहीं आ पाएंगे मगर मैं फिर भी मुन्तज़िर रहूंगी और यही कहूँगी ;

तू अगर प्यार से सुन ले तो ग़ज़ल हो जाऊं
एक नाज़ुक सा मैं शफ्फाफ़ कँवल हो जाऊं

जब भी तू प्यार से देखे है मुसलसल मुझ को
ताज से और हसीं ताजमहल हो जाऊं

तेरे माथे कि शिकन हूँ तो मैं शर्मिंदा हूँ
बड़ी मुश्किल में हूँ हंस दे तो सहल हो जाऊं

तेरा साया जो मेरे जिस्म पे पड़ जाता है
मैं तो मीरा का कि लैला का बदल हो जाऊं

जिस घड़ी तुम को हुई थी जी मुहब्बत हम से
दिल यही चाहे है फिर से वही पल हो जाऊं

तू मुझे वक़्त के क़ानून से रख दूर ज़रा
मैं नहीं चाहती कि गुज़रा हुआ कल हो जाऊं

आईना देख के शर्माए ना तुझ से ऐ 'हया'
इतना सिंगार ना करना कि मैं छल हो जाऊं .

अपनी तमाम बहिनों को महिला दिवस पर अपने बाअदब,बाहया वुजूद के होने का एहसास हो ,इन्ही शुभकामनाओं के साथ ......

'' औरत होने पर फख्र करो ''

Tuesday, February 16, 2010

पस्ती -ऐ -इंसां

शर्मिंदा हूँ ,ग़मज़दा भी हूँ ,अफ़सोस और पछतावा भी है की इतने लम्बे अरसे के बाद ब्लॉग को छुआ है .कभी कभी इंसान चाहकर भी अपना मन पसंद काम नहीं कर पाता .क्या कहूं ,वक्त नहीं था ?किसी के पास नहीं है आज के दौर में, पर हकीकत येही है .प्रोग्राम्स और शूटिंग ने कुछ इस कदर घेर लिया कि जब भी ब्लॉग खोलना चाहा ,ज़हन, जिस्म और आँखों ने साथ देने से मना कर दिया, पर मैंने आप सब की लेखनी, राय और दुआओं की कमी को बहुत महसूस किया. कोशिश करुँगी के आइन्दा कभी इतना लम्बा अंतराल न आये.

कुछ मेल मेरे लिए आपकी मोहब्बतों का सबूत दे गए .शुक्रिया

26 जनवरी गयी ,30 जनवरी गयी ,14 और 15 फ़रवरी गयी ,हर मौके पर चाहा की कोई ग़ज़ल पोस्ट करूँ लेकिन चूक गयी और अब जब आप सब के मुखातिब हो रही हूँ तो अफ़सोस की फिर बम ब्लास्ट कि सिहरन से मेरी ग़ज़ल कांप रही है.

यहाँ बम है ,वहां बम है ,इधर बम है ,उधर बम है
यही पूछे है हर कोई ,फटा इस पल किधर बम है
घरों में बम ,दुकां में बम ,गली में बम ,कहाँ न बम?
लहू के रंग का अख़बार है हर इक खबर बम है


यही तो होता आ रहा है ,कुछ दिनों कि ख़ामोशी के बाद फिर कहीं बम फट पड़ता है
न जाने कब तक ये सिलसिला चलता रहेगा .इतने दिनों के अंतराल में भी हर पल, हर जगह, हर शहर, हर मौका, हर अवसर, हर मंच पर, हर शख्स के बीच मैंने यही महसूस किया :-

जहां जहां मुझे इन्सां दिखाई देता है
न जाने क्यूँ वो परिशां दिखाई देता है

उरूज पर है बहुत अब तो पस्ती -ऐ -इंसां
गुनाह करके भी नाज़ां दिखाई देता है

ये कैसा गुलशन -ऐ -दुनिया में इन्कलाब आया
के जो चमन है वो वीरां दिखाई देता है

कभी जफ़ाओं का शिकवा नहीं किया मैंने
वो बेसबब ही पशेमां दिखाई देता है

मुझे दुआओं की सौगात सौपने वाले
तेरा ज़मीर दरख्शां दिखाई देता है

ये इन्तहा -ऐ-जुनूं है की राहे मंजिल में
खुद अपना साया निगेहबां दिखाई देता है

उड़ा रहा था यही तो 'हया ' मजाक -ऐ -वफ़ा
जो आज सर-ब-गरीबां दिखाई देता है

उरूज = उन्नति
पस्ती -ऐ -इंसां = इंसां का पतन
नाज़ां = घमंडी
जफा = बेवफाई
पशेमां = शर्मिंदा
दरख्शां = रौशन
सर -ब -गरीबां = घुटनों तक झुका हुआ सर


क्या कहूं वेलनटाइन डे पर ?आप के बहुत मेल मिले लेकिन मैं जवाब में इसके सिवा क्या कहूं ?

खून,चीखें ,सनसनी ,मातम ,तबाही दहशतें ,
मुल्क में हथियार ,बारूदों का राशन आ गया
मंदिरों में ,रेल में ,मस्जिद में ,होटल ,मॉल में
फट रहे हैं बम ,समझ लो के इलेक्शन आ गया

सब कुर्सी के खेल हैं ,सियासत का चक्कर है ,नेताओं की आपसी रंजिश है ,जिसने मासूम जनता को मोहब्बत के दिन ये खूनी तोहफा दिया है ,काश सरहदें और सियासत मोहब्बत के मानी समझ पाती !!! !

कैसे कहूँ बी-लेटेड हैप्पी वेलनटाईन डे ?



Friday, January 1, 2010

इबादत भी ज़रूरी है

चलो अब वार बन जाएँ ,के अब तलवार बन जाएँ
के अब तेज़ाब की बहती हुई इक धार बन जाएँ
बहुत ठंडी हवा बनकर बहे ,अब आंधियां बनकर
बग़ावत का नया इक सिलसिला ,विस्तार बन जाएँ

गुज़िश्ता कई वर्षों के हालात को मद्दे -नज़र रखते हुए आप सबको नरम तेवर वाली दुआएं देने को दिल नहीं राज़ी हुआ, लगा के महज़ इतना कहना काफ़ी नहीं के आप सबको नव वर्ष की बधाई ,....आपका चहुंमुखी विकास हो, आप स्वस्थ और सुरक्षित रहें, आप सपरिवार पूरे साल खुशियों में संलग्न रहें, वगैरह वगैरह...नहीं- नहीं बस इतना नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ अपने वादों ,अपने इरादों ,अपनी नीयत और योजनाओं में शामिल करना "ज़रूरी है" तो क़ुबूल कीजिये नए साल में इस अज्म और हौसले के साथ मेरी ये दुआएं / सलाहें :-



ये माना कि मुक़द्दर की इजाज़त भी ज़रूरी है
मगर मंज़िल को पाना है तो मेहनत भी ज़रूरी है

हवा जब तक हवा है तब तलक ही दोस्ती रखना
बने आंधी तो फिर उससे अदावत भी ज़रूरी है

अगर हो जान को ख़तरा औ ख़ुद्दारी ख़तर में हो
पलट कर वार कर देना हिफाज़त भी ज़रूरी है

ये माना कि तअल्लुकात में कोई ग़रज़ ना हो
मगर खुदगर्ज़ रिश्तों से सियासत भी ज़रूरी है

हो बेशक़ रूबरू दुश्मन मगर इतनी सनद रखना
हो लहजा तल्ख़ प थोड़ी नफ़ासत भी ज़रूरी है

फ़क़त दौलत, मकां, रिश्ते, ज़मीं,शोहरत, ख़ुशी, दुनिया
दिये जिसने सभी उसकी इबादत भी ज़रूरी है

मैं अपनी गुफ़्तगू उर्दू बिना कर ही नहीं सकती
'हया' के वास्ते इससे सख़ावत भी ज़रूरी है

अदावत - दुश्मनी
खतर - ख़तरा
प - पर
रूबरू - सामने
तल्ख़ - कड़वा
गुफ़्तगू - बातचीत
सनद - याद
सख़ावत - दोस्ती

आप तमाम ब्लागर्स का जिन्होंने २००९ में मुझे हसीन-तरीन कमेंट्स से नवाज़ा शुक्रिया अदा करती हूँ, इस साल और भी मुहब्बतों की मुन्तज़िर हूँ और इजाज़त लेने से पूर्व ख़ास तौर पर इन अलफ़ाज़ के साथ जवाब देना चाहती हूँ

इतने प्यारे बनो हर कोई तुम्हे प्यार करे
हो ज़बां ऐसी कि हर कोई ऐतबार करे
तुमसे इक बार मुलाक़ात जो करले तो 'हया'
फिर मिले दिल यही उसका हाँ बार-बार करे

आप सबसे फिर,बार-बार मिलने की चाह में नए साल की ढेरों शुभकामनाओं के साथ


चलते चलते :-

हाज़रीन, आज रात ( दो जनवरी ) बिरला आडिटोरियम मुंबई, में मुशाइरा है .उसी की तैय्यारी करते करते इस ग़ज़ल में दो शेर और हो गये, उन पर भी नज़र डाल लीजिये,कभी कभी कलाम मुकम्मल होने के बाद भी कुछ तश्नगी बाकि रह जाती है ,ये अशआर उसी तश्नगी का नतीजा है...


फ़क़त इसके सिवा इस साल-ए-नौ मैं और क्या मांगूं
अरे अब छोड़ भी नफ़रत,मोहब्बत भी ज़रूरी है

बनो नेता, चलो दिल्ली,पकड़ कुर्सी मगर ऐ जी!
ज़रा सी इस फ़साने में शराफ़त भी ज़रूरी है

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