Saturday, February 5, 2011




आख़िर मेरे अंगूठे का प्लास्टर उतर गया , दर्द ज़रूर बाक़ी है,ज़ख़्म भी भर चुका है मगर रह रह कर उठती कसक हादसों की याद ताज़ा कर जाती है
किसी ने कहा भी है ना; "मौत तो घर के अन्दर भी आ सकती है " तो बस वैसे ही मेरे साथ दो हादसे घर में ही , चलते फिरते हो गए - जैसे उन्हें तो होना ही था , जैसे कोई बिन बुलाया मेहमान ज़बरन घर में घुस आये ।
सोचती हूँ तो उलझ जाती हूँ कि ये टल भी तो सकते थे ? अगर मै ऐसा ना करती तो शायद ऐसा ना होता , वैसा ना करती तो शायद वैसा ना होता ।
इन्सान की फ़ितरत है जी पीछे मुड़ - मुड़ के देखना ,ख़ुद से उलझना लेकिन "होनी को कौन टाल सकता है '' तो बस ये "होनी" थी तो "होनी" ही थी - हड्डी टूटनी थी तो टूटी , चिन ज़ख़्मी होनी थी तो हुई ,बेशक लापरवाही मेरी भी थी , मै कम ज़िम्मेदार नहीं हूँ ? अब भला क्या ज़रूरत थी जल्दबाज़ी करने की,हाय तौबा मचाने की ; माना "वापी" कवि सम्मलेन में जाना था तो भी इतनी जल्द बाज़ी? आख़िर फिसल गयी ना? अंगूठे की हड्डी तो टूटी ही , चिन ज़ख़्मी हुई सो अलग तो बस कवि सम्मलेन तो गया तेल लेने ,अंगूठा दबाके बैठ गयी ।

वक़्त को बहुत अंगूठा दिखाते है ना हम ? भाग दौड़ कर कर के ? २४ घंटे में कभी -कभी अड़तालीस घंटे का काम करते हैं लेकिन जब वक़्त अंगूठा दिखाता है तो २४ मिनट का काम २४ घंटे में भी नहीं हो पाता और कभी - कभी तो २४ महीने भी लग सकते हैं ।जैसे कभी कभी ग़ज़ल का एक मिसरा तो हो जाता है , दूसरा हो ही नहीं पाता, होता भी है तो एक अरसे बाद

पहले तो यक़ीन ही नहीं हुआ कि fracture हुआ होगा लेकिन जब दर्द और सूजन ने अपना रंग दिखाना शुरू किया तो जाना पड़ा मजबूरन डॉक्टर के पास और लो चढ़ गया प्लास्टर - वैसे प्लास्टर भी बड़े advanced,fashionable हो गए हैं , फिरोज़ी color का प्लास्टर देखते ही बनता था - मेरे सैमसंग मोबाइल से बिलकुल मैच करता हुआ - कभी मेरे कपड़ों और purse से भी मैच कर जाता था तो अक्सर सब ये पूछते कि ये क्या है? प्रोग्राम में दूर से दर्शकों को वोह किसी दस्ताने का सा एहसास देता था , जब तक ख़ुद ना बताओ कि भाई मेरे ये प्लास्टर है ,लोग इसे फैशन का ही एक हिस्सा मान बैठे थे - ख़ैर , उस ख़ूबसूरत प्लास्टर के साथ कार्यक्रम तो ख़ूब किये,तक़रीबन १२-१३ - जैसे उपरवाला compensate करना चाहता हो - कहते हैं ना कि वोह इम्तहान लेता है तो हौसला मंदों को नंबर भी ख़ूब देता है -वैसे तो उसके करम से काम की कोई कमी नहीं लेकिन इस बार तो जैसे एक साथ तांता सा लग गया था - वक़्त कहाँ बीत गया पता ही ना चला । शूटिंग भी शॉल ओढ़कर करली ( इंसान चाहे तो मुश्किल घड़ी में कोई रास्ता तलाश ही लेता है )
वाक़ई इंसां दर्द को नज़र अंदाज़ करे , हालात से दोस्ती करले ,वक़्त को अपनाकर मेहनत को साथ ले ,हौसले की डगर पर चल काम में लग जाए तो हादसों को भुलाना तक़रीबन आसान हो सकता है फिर भी ख़ुदा से यही दुआ है क़ि वोह ना केवल सिर्फ़ मुझे बल्कि सबको महफूज़ रखे ठीक वैसे ही जैसे उसने मुझे अनगिनत हादसात झेलते हुए भी रखा हुआ है - यक़ीन जानिये, अगर मैंने सब का ज़िक्र करना शुरू कर दिया तो आप मुझे "राणा सांगा की बहिन" का ख़िताब दे देंगे और ये तो सिर्फ़ जिस्मानी हादसात की एक झलक मात्र थी ,औरत होने के नाते मानसिक ,रूहानी,दिली हादसात भी झेलने पड़ते हैं जिसे मेरी तमाम blogger सखियाँ , सह पाठिकाएं , लेखिकाएं ,बखूबी समझ सकती हैं । औरत की यही ख़ासियत है कि वो जितना ज़ख़्मी होती है उतना मज़बूत होती जाती है

कौनसा ऐसा हादसा होगा जो मैंने ना झेला होगा लेकिन मेरे मालिक का करम है कि उसने हर चोट के साथ एक मज़बूती का एहसास दिया।
कभी अपनी autobiography लिखी तो एक एक का ज़िक्र करती चलूंगी
कभी कभी तो सोचती हूँ "हादसे" उन्वान से एक blog ही खोल दूँ और उसमे पहली ग़ज़ल ये डालदूं :-


हादसों से मेरी वैसे तो है पहचान बहुत
फिर भी बेख़ौफ़ हूँ , ख़ुशबाश मेरी जान बहुत

इतना आसां नहीं माज़ी से बग़ावत करना
ज़लज़ले
उठते हैं , आजाते हैं तूफ़ान बहुत


उसकी
तजवीज़ के आँखें मेरी उसको देखें
ये
वो मुश्किल है जो उसके लिए आसा बहुत


मेरा शाईस्ता ज़हन मुझको ये समझाता है
दिल
की अवाज ना सुन , दिल तो है नादाँ बहुत


वक़्त
के साथ फ़ना होती हैं कितनी ख़ुशियाँ
और
मादूम हुए जाते हैं अरमान बहुत


ज़िन्दगी
तेरी मैं तफ़सीर करूँ भी कैसे?
पढ़ ही पायी हूँ कहाँ मै तेरे फरमान बहुत?

" हया " लिखनी है हस्सास ग़ज़ल जो तुमको
किसी
हीले से करो दिल को परेशान बहुत

- - -

हस्सास:- sensitive
हीले:- bahane
मादूम:- धुन्दला पढ़ जाना
तजवीज़:- proposal
तफसीर:- व्याख्या




और हाँ, आप सब की दुआओं ने मुझे बहुत हौसला दिया , पुरसिशे हालात का बहुत - बहुत शुक्रिया


THANK YOU


Sunday, January 2, 2011

हो जाये साले-नौ में मुहब्बत पे गुफ़्तगू?

Bold
मेरा हाल तो मत पूछिए ; ज़ख़्मी हूँ , नए साल का आग़ाज़ हादसे के साथ हुआ लेकिन अभी उसका ज़िक्र करके आप सबको दुखी नहीं करना चाहती क्यूंकि अपनों की तकलीफ़ जानके अपनों को दुःख होता है इसलिए वो रुदाद अगली पोस्ट में, बस इतना जान लीजिए कि कभी - कभी वक़्त और हादसे भी ज़िन्दगी के साथ सियासी खेल खेल जाते है और मेरे साथ ये खेल बचपन से खेला जा रहा है पर छोडिये , आज बस इतना ही कहूँगी ;

छोडो, बहुत हुई है, सियासत पे गुफ़्तगू
होजाए साले-नौ में मुहब्बत पे गुफ़्तगू

बर्बाद करके जाएगा ये वक़्त देखिये
करते रहे जो हम यूँही नफ़रत पे गुफ़्तगू

जब भी करो हो बात तो "सूरत" पे करो हो
बेहतर यही है आज हो "सीरत" पे गुफ़्तगू

मुंह पे कहे है 'वाह' पीछे कहे है 'हुंह'
और मै करूं जो तेरी जहालत पे गुफ़्तगू?

आदर्श लोग बैठ शहीदों की क़ब्र पे
चुपचाप कर रहे हैं जी राहत पे गुफ़्तगू

उर्दू ज़ुबान और ये क़ुदरत के फ़रिश्ते
छुप छुप के करें शब में मेरी छत पे गुफ़्तगू

गर ख़ैर चाहते हैं तो घर लौट जाइए
नेता जी कर रहे हैं हिफ़ाज़त पे गुफ़्तगू

गर ये अमीर--शहर है, अफ़्सोस है हमें !
ग़ुरबत से कर रहे हैं जो इस्मत पे गुफ़्तगू

मंज़िल की जब तलाश में घर से निकल पड़े
हम फिर नहीं करते हैं मुसाफ़त पे गुफ़्तगू

इस शहर में तो ख़ुद से भी जब जब हो मुलाक़ात
होती है सिर्फ़ दौलत--शोहरत पे गुफ़्तगू

उस आदमी का ज़हन तो मफ्लूज है "हया"
करता है बेहयाई से औरत पे गुफ़्तगू

- - -

ग़ुरबत :- ग़रीबी
मुसाफ़त:- सफ़र
मफ्लूज:- लक़वा मारा हुआ




नया साल साल बहुत बहुत मुबारक हो

Sunday, December 12, 2010

मैं intelligent होगई हूँ




ख़ुदा गवाह ही कि जो कह रही हूँ सच कह रही हूँ :-
"देखा, मैं तेरी ख़ुशबू से intelligent होगई हूँ " ये सुनते ही मैं चौंक पड़ी , यक़ीन करना मुश्किल हो रहा था कि ये जुमला मेरी उस बुज़ुर्ग माँ की ज़बान से निकला था जो दस दिन पहले जब मेरे सुपुर्द की गयी थी(भाई ऑस्ट्रेलिया गया था),ना ठीक से चल पाती थी , ना समझ पाती थी ,जिनकी आँखों की रौशनी और याददाश्त उम्र कि वजह से कमज़ोर हो चली है और जिसने आते ही ये सवाल किया था कि तू पिंकी ही है ना?(my nickname) ,उसकी ज़बान से ये जुमला !
तक़रीबन दोपहर ४ बजे का वक़्त था , etv urdu पर mushaira आ रहा था , मुझे १४ नवम्बर को नेहरु रत्न अवार्ड मिलने वाला था , मैं वहां जाने के लिए तैयार हो रही थी , मम्मी को उस दिन सुब्ह तैयार नहीं कर पायी थी ,इन दिनों वो सारे फ़र्ज़ मुझे अदा करने पड़ रहे है जो बचपन में माँ हमारे लिए किया करती थी तो मैंने मम्मी से कहा कि चलो आपको ग़ुस्ल करवा दूं , फिर मुझे जाना है ; उधर mushaire में शेर पढ़ा जा रहा था "मोहब्बत नहीं है आसान मामू " माँ बड़े गौर से सुन रही थी , इधर मेरी गुहार , उधर अशआर , तो बस यूं लगा जैसे मेरी माँ में किसी शायर की रूह घुस आई हो , अचानक शुरू हो गयीं , "मुश्किल है अब इन्कार सरला( उनका नाम),होगई है तू ...... रुक गयीं, बोलीं "बता ना आगे क्या होगा? ",मैंने कहा " हो गयी है तू लाचार सरला " , तो ख़ुश हो गयीं "हाँ " फिर दूसरा मिसरा लगाना शुरू किया , "बेटी का है फरमान सरला" और यक़ीन जानिये कि क्या-क्या बोलती गयीं - मैं हैरान और परेशान और जब उन्होंने ये कहा " अब तो पड़ेगा ही नहाना , आगे नहीं आता है बनाना " तो मेरी ज़बान से निकला कि , वाह ! अरे मम्मी आप तो शायरी कर रहीं हैं और फिर .............. उनकी ज़बान से ये जुमला निकला " देखा? तेरी खुशबू से मैं intelligent होगयी हूँ"और ये कह कर उन्होंने मेरा गाल चूम लिया .

उनकी ज़बान से निकली हुई ये बात मुझे छू गयी । विरासत में हमें उनसे बहुत कुछ मिला है । राजस्थान के cheif minister की steno रह चुकी हैं लेकिन बुढ़ापा इंसान को जिस मरहले पे ले आता है , वहाँ हमें ये सोचना चाहिए कि हमारे parents सिर्फ़ बुज़ुर्ग हुए हैं ,मरीज़ नहीं जबकि हम उनके बुढ़ापे को एक लाइलाज रोग समझकर घर के एक कोने में 'रख' देते हैं ; ख़ुशनुमा माहौल के बगैर तने तन्हा पड़े पड़े ये माँ बाप वक़्त से पहले ही चल देते हैं ।
जिस तरह मशीनों को तेल की, गाड़ियों को पैट्रोल की , पेड़-पौधों को खाद की ज़रूरत होती है , उसी तरह बुज़ुर्गों को रौनक़ की, साथ की , देखभाल और प्यार की ज़रूरत होती है ।

मेरी माँ की ये तस्वीर चीख़-चीख़ कर कह रही है कि children day सिर्फ़ parents द्वारा बच्चों को प्यार बाँटने का दिन नहीं बल्कि बच्चों द्वारा भी parents की केयर करने का दिन होना चाहिए
हम कितने भी बड़े हो जायें उनके लिए बच्चे ही रहेंगे और जब वो बच्चे की तरह हो जायें तब हमें भी उनके साथ बच्चों जैसा प्यार बाँटना चाहिए .............बाल दिवस पर ये matra - ratna award एक बेटी के लिए नेहरु ratna award से किसी भी तरह कम ना था .

यही सोचते - सोचते जब मैं function में पहुंची और जब मेरे हाथ में mike थमाया गया तो यक- ब -यक मैं ये घटना सुना बैठी , सब गौर से सुन रहे थे , महसूस कर रहे थे .........

उस दिन मुझे इस बात का और यक़ीन हो गया कि सिर्फ़ संगीत की ताक़त ही किसी रोग का इलाज नहीं करती बल्कि शब्द की शक्ति ,अल्फाज़ की ताक़त , अदब का असर और शायरी की ख़ुशबू भी दवाई सा काम करती है .......... वो ख़ुशबू मेरी नहीं,उर्दू की थी , ज़बान की थी,शायरी की थी जिसने मेरी माँ को चंद लम्हों के लिए "intelligent" बना दिया था ।
आज उनको ये घटना याद भी नहीं है ,वो भूल चुकी हैं कि मैंने ऐसा भी कुछ कहा था लेकिन मैंने सोच लिया है कि मैं अब उनके आस पास शायरी को ज़िंदा रखूंगी और सिर्फ़ 'पिंकी' बन कर नहीं , उर्दू और शायरी बनकर रहूंगी ;


मेरी तो ज़ात-पात, धर्म, दीन शायरी
ये घर ,मकां ,जहां ,फ़लक ,ज़मीन शायरी

देखा जो तुमने प्यार से तो यूं लगा मूझे
जैसे कि हो गयी हूँ मैं हसीन शायरी

ख्वाहिश की तितलियाँ बड़ी कमसिन है, शोख़ हें
इनके तुफ़ैल होगयी रंगीन शायरी

सरज़द हुई हैं ऐसी भी दिल पर हक़ीक़तें
रिश्तों
का लिख गयी नया आईन शायरी

ग़ैरत की लाश हाथ में लेकर ग़ज़ल कहूं
तेरी
कर सकूंगी यूं तौहीन शायरी

लैला -- शायरी हूँ मेरा क़ैस है सुख़न
ये
जुर्म है तो दे सज़ा , ना छीन शायरी

इक लम्स है ये शायरी मेरे लिए ' हया '
उनकी
नज़र में लाम , मीम , सीन, शायरी

- x - x - x -



ग़ुस्ल करना = नहाना
तने तन्हा =बिल्कुल अकेला
तुफैल = वजह
आईन= संविधान
सरज़द = घटित
क़ैस = मजनू का नाम
लाम मीम सीन = means l ,m, s( in urdu)

Sunday, October 24, 2010

सोचती रही



कभी-कभी अनमनी सी हो उठती हूँ मैं ,कुछ करने को जी ही नहीं चाहता ,गुमसुम सी,दिल-दिमाग़ जैसे कहीं खो जाते हैं,कोई वजह भी तो नहीं होती ,न कोई ग़म , न कोई शिकायत,न कोई सदमा,न दिल टूटने जैसी कोई बात , बस अचानक ही ऐसी कैफ़ियत तारी हो जाती है ।
ये सिलसिला आज से नहीं , सालों से चला आ रहा है, उस वक़्त से जब मै शायद जज़्बातों का ,कुछ बातों का ठीक से मतलब भी नहीं समझ पाती थी । आप यक़ीन जानिए ,जब मै exam देती थी,तब भी अक्सर ऐसा हो जाता था ,जयपुर दूरदर्शन पर news reading करती थी तब भी - बस दिमाग़ ,हाथ ,आँखें अपना काम करती थीं ,"मैं " कहीं और होती थी , news editor mr.Singhvi कहा करते थे - "इसके पास कोई खड़े रहो वरना ये पता नहीं कहाँ चली जाएगी,न्यूज़ की ऐसी-तैसी हो जाएगी। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है ?

अब देखिये ना - २ october गया ,commonwealth games आये-गए ,नवरात्र गुज़र गयी ,दशहरा बीत गया लेकिन कुछ पोस्ट करने को दिल ही नहीं हुआ । पता नहीं क्यूँ ? कभी-कभी दिल का चैनल चाहता है कि तसव्वुर के स्क्रीन पर कोई पिक्चर चलाऊं तो दिमाग़ का रिमोट काम नहीं करता , दिमाग़ कुछ ख़यालात download करना चाहता है तो मूड का केबल disconnect हो जाता है - हाथ यादों के रिमोट को पकड़कर कई चैनल चलाना चाहते हैं ; यादों के,बचपन के, रिश्तों के,काम के ,महफ़िलों के,तन्हाईयों के,तकलीफों के ,मेहनतों के लेकिन जोश का ,प्रेरणा का ,दिलचस्पी का fuse उड़ जाता है , दिल सब से मुलाक़ात करना चाहता है तो रूह तन्हाई की मांग करने लगती है ,नज़र कई मौज़ुआत पे पड़ना चाहती है तो पलकें आँख पर पर्दा डाल देती हैं ; ज़िन्दगी सच्चाईयों से इश्क़ करना चाहती है तो सोचो - फिक्र ख़ुदकुशी कर लेते हैं और फिर मैं ही ग़ज़ल और शेरों का वरक़ के बीच रस्ते में ही क़त्ल कर देती हूँ --------- ये honor killing-सा मामला क्या है ? कल रात बस मै यही सोचती रही - सोचती रही - सोचती रही .......


मौज़ूअ रात भर मैं कई सोचती रही
मै थक गयी ,समझ न सकी ,सोचती रही

बेचैनियाँ पहुँच ही गयीं थीं उरूज पर
मै करवटें बदलती रही ,सोचती रही

बादल फ़लक पे आ तो रहा था नज़र मुझे
बरसेगा कब तलक ? मै यही सोचती रही

मै चाह कर भी दे न सकी बद्दुआ उसे
फिर किसकी हाय उसको लगी ,सोचती रही

यूं भी हुआ के छू सकी मुद्दतों क़लम
लेकिन ग़ज़ल मैं फिर भी नई सोचती रही

गर मिलके बिछड़ना ही लिखा था नसीब में
फिर किस लिए मै उससे मिली ,सोचती रही

तुम ख़ुश रहो ! ये बोल के वो तो चला गया
मै वहीं खड़ी की खड़ी सोचती रही


क्या लाज रख सकेंगे "हया" की वो मुस्तक़िल
उसके क़रीब जब भी गयी ,सोचती रही


x-x-x

Wednesday, September 22, 2010

हिन्दू हैं,मुल्क हिंद है,हिंदी परायी है !


मैं देर करती नहीं ,देर हो जाती है,हालाँकि इस बार उचित कारणों से हुई है,हिंदी पखवाड़ा,गणेश महोत्सव,ईद मिलन के कार्यक्रमों में वक़्त कहाँ गुज़र गया,पता ही नहीं चला। जैसे हम साल भर हिंदी के लिए हिंदी दिवस का इंतज़ार करते हैं ,वैसे ही मैं भी हिंदी की पोस्ट के लिए एक ख़ाली दिवस का इंतज़ार कर रही थी जो आज मिला है ।हालांकि ज़हन में कशमकश चालू थी की आपको हमको भी तो मिलना हैं- मेरी ग़ज़ल "ज़रूरी है" पर किसीने एक कमेन्ट किया था उसे ही शेर के तौर पर आप तक पहुंचा रही हूँ-

चलो माना बहुत मसरूफ है ये ज़िन्दगी लेकिन
मुहब्बत करने वालों से मुहब्बत भी ज़रूरी है

और आप सब तो (ब्लॉग जगत)net पर मेरी पहली मुहब्बत हैं और इन्सान अपनी पहली मुहब्बत को कभी नहीं भूलता,हालांकि आप सब इधर-उधर रक़ीबों के साथ भटकते-भटकते टकरा जाते हैं - कभी facebook पर,कभी ट्विटर पर तो कभी और कहीं मगर फिर लौट कर यहाँ आ जाते हैं,शायद इसी लिए मशहूर शायरा (पाकिस्तान) परवीन शाकिर साहिबा ने कहा होगा-

वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की

तो जनाब यहाँ मिलने का मज़ा ही अलग है क्यूंकि ब्लॉग-जगत तो भाषा-प्रेमियों का सब से रोमांटिक स्थल (लव पॉइंट)है ; यहाँ हिंदी को propose किया जाता है,उसके साथ डेटिंग की जाती है,प्यार भरी गुफ़्तगू की जाती है,कहीं कहीं मैंने तक़रार के नज़ारे भी देखे हैं,कभी शिकायतें होती हैं,गिले-शिकवे होते हैं,रिश्ते टूटते हैं फिर जुड़ जाते है और फिर सब घुल मिलकर वापस गले मिल जाते हैं जैसे हिन्दुस्तानी अपनी महबूबा हिंदी भाषा को साल भर फरामोश करके फिर एक दिन मिल जाते हैं तो ब्रेक ऑफ़ और patch up की इस अदबी दोस्ती-दुश्मनी के मंच पर मेरी मुबारकबाद क़ुबूल करते हुए ग़ज़ल के मतले पर गौर फरमाएं :-

यूँ तो समन्दरों से मेरी आशनाई है
मेरी प्यास में भी अजब पारसाई है


राहत की बात ये है के बेदाग़ हाथ हैं
उरयानियत की हमने हिना कब लगायी है


छोटी को निगल जाएँ बड़ी मछलियां मैं
ज़िंदा हूँ इनके दरमियाँ,क्या कम ख़ुदाई है ?


जा मैंने इस्तफादा किया अश्क से तो क्या
तुझको नमी क्या आँख की मैंने दिखाई है ?



इससे बड़ा मज़ाक़ तो होगा भी क्या भला
हिन्दू हैं,मुल्क हिंद है,हिंदी परायी है !



हमको तमाशबीन जो कहते हैं,हैफ़ है
और वो ? दुकान जिसने सदन में लगायी है


ये सोच कर के बात बिगड़ जाये ना कहीं
मैंने लबे-"हया" पे खमोशी सजाई है

--------------
प = पर
आशनाई= जान पहचान
पारसाई = सब्र ,संयम
इस्तफादा= फायदा उठाना
उर्यानियत =नग्नता

खमोशी= ख़ामोशी

Saturday, September 11, 2010

वाह ! बप्पा से गले ईद मिली हो जैसे





त्यौहारों का मौसम है,आसमां में आतिशबाज़ी,बाज़ारों में रौनक़,रिश्तों में गर्माहट,घरों से उठती पकवानों की महक,मुहब्बत से गले मिलते लोग,गलियों में शोर मचाते बच्चे,घरों में ईद और गणपति की तैयारियों गलियों और सड़कों पर सजावट,जगह जगह क़ौमी एकता का पैग़ाम देते पोस्टर्स,रह-रह के उठती ढोल,नगाड़ों की आवाज़,वाह !वारी जाऊं अपने हिंदुस्तान के इस हुस्न पर.

इस बात तो ये ख़ुशी दुगनी हो गयी है ईद - गणपति एक साथ ! रमज़ान की शुरुआत में रक्षा बंधन,बीच में जन्माष्टमी और अब गणपति सब साथ-साथ तो हम अलग कहाँ हैं ?अलग क्यूँ हो जाते हैं ?
कब और कैसे हो जाते हैं ? जब हमारा मुल्क एक, हमारी खुशियाँ एक, हमारे त्यौहार और और देवगण एक साथ हो जाते हैं तो हम क्यूँ अलग हो जाते हैं ? क्या हम हमेशा एक साथ ऐसे ही हंसी-ख़ुशी नहीं रह सकते ? ज़रा सोचिये ये एक साथ आने वाले त्यौहार हमें क्या कहना चाह रहे हैं ?

बहरहाल आप सब को ईद और गणपति की बहुत बहुत शुभकामनाओं और मुबारकबाद के साथ पेश है एक नज़्म


फिर मेरे दिल में मुहब्बत ने सदायें दी हैं
ईद आई है तो ख़ुशियों की दुआएं की हैं

ज़िन्दगी आज रफ़ाक़त में रंगी हो जैसे
आज बप्पा से गले ईद मिली हो जैसे

ऐसे दिन नाम अदावत का कोई लेता है
राम भी आज मोहम्मद से गले मिलता है

मुख्तलिफ़ क़ौमों के त्यौहार जुदा हैं लेकिन
एक पैग़ाम है,अवतार जुदा हैं लेकिन

मेरी होली के तेरी ईद या दीवाली हो
पर्व कहते हैं के हर धर्म की रखवाली हो

कुंदज़ेहनो का तो बस एक ही मज़हब - नफ़रत
इन रिवायात का बस एक ही मतलब -नफ़रत

नफरतें दिल में जो फट जाती हैं इक बम बन कर
ईद आ जाती है उन ज़ख्मों का मरहम बनकर

आज इस यौमे - मुहब्बत की क़सम है हमको
अपने रोज़ों की,इबादत की क़सम है हमको

हम ना आयेंगे फरेबों में सियासतदां के
धर्म के नाम पे जो मुल्क को,दिल को बांटे

है मसर्रत का यह दिन फिर भी उदासी सी है
आज चुप -चुप है फ़लक और ज़मीं रोई है

चाँद भी रात को मायूस लगा था मुझको
ये मेरा वहम सही उसने कहा था मुझको

नफरतें चीर के जिस रोज़ उजाला होगा
कोई बेबस,न ज़मीं पे कोई भूका होगा

जब ग़रीबी नए मलबूस पहन पायेगी
झोपड़ी से भी सिवैय्यों की महक आयेगी

दीद हर चेहरे पे जिस रोज़ ख़ुशी की होगी
ईद के हाथों में यक्जेहती की ईदी होगी

ये तगय्युर मुझे जिस रोज़ नज़र आयेगा
ईद का चाँद " हया " और निखर जायेगा ।

रफ़ाकत = दोस्ती
अदावत = दुश्मनी
मुख्तलिफ़ = अलग अलग
कुंद ज़ह्नों = संकीर्ण विचार
रिवायत = रस्में
यौमे मोहब्बत = मोहब्बत का दिन
मसर्रत = खुशी
सियासत दां = नेता
फ़लक = आसमान
मलबूस = कपड़े
तगय्युर = परिवर्तन

विशेष: नांदेड से मेरे एक शुभ चिन्तक जनाब मजिदुल्लाह साहब ने मेरे अशआर को ईद की ग्रीटिंग का अक्स दिया है जिसे मैं आप सबसे शेयर करना चाहती हूँ.आप से निवेदन है के मेरी साईट
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